सरकारी समितियों पर डीएपी 1350 रुपये प्रति बोरी की दर से मिलती है, वहीं खुले बाजार में यही खाद 1700 रुपये प्रति बोरी तक बेची जा रही है। बढ़े हुए दामों के कारण अधिकांश छोटे किसान बाजार से खाद खरीदने में असमर्थ है। डीएपी के अभाव में खेतों में पहले की गई पलेवा (सिंचाई के बाद की मिट्टी की तैयारी) अब सूखने लगी है। कई किसानों ने बताया कि अगर अगले कुछ दिनों में खाद की आपूर्ति नहीं हुई तो बुवाई का समय निकल जाएगा और उपज पर बुरा असर पड़ेगा।
खैर में 20,000 टन से अधिक डीएपी की तत्काल जरूरत
किसानों का अनुमान है कि क्षेत्र में अब भी लगभग 20,000 टन से अधिक डीएपी की तत्काल आवश्यकता बनी हुई है, जबकि आपूर्ति की कोई ठोस व्यवस्था अभी तक नहीं दिख रही। किसान संगठनों ने जिला प्रशासन और कृषि विभाग से मांग की है कि डीएपी की आपूर्ति जल्द सुनिश्चित की जाए और वितरण की पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए, ताकि किसानों को बाजार की ऊंची कीमतों पर निर्भर न रहना पड़े।
अतरौली क्षेत्र में 10 दिनों से किसी भी सहकारी समिति पर डीएपी उपलब्ध नहीं है। किसान डीएपी के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं। किसान नवीन चौधरी, वीरेंद्र सिंह, वीरपाल सिंह ने बताया कि परेवट कर चुके किसानों को तत्काल डीएपी की जरूरत है ताकि वह परेवट सूखने से बुवाई में देरी होगी। पीसीएफ केंद्र पर बृहस्पतिवार व शुक्रवार को खाद वितरण की सूचना पर भीड़ उमड़ पड़ी। अतरौली की उत्तरी व दक्षिणी समिति पर दस दिन से खाद नहीं है। यही हाल मलहपुर, बड़ेसरा, पालीमुकीमुपर समितियों का है।
नहल साेसाइटी पर एक माह से डीएपी नहीं
गांव जगतपुर के बनी सिंह, रामपुर के मुकेश भारती, खेड़िया के रामभान सिंह, खानपुर के पवन चौधरी ने बताया कि इस सोसाइटी से 19 गांव जुड़े हैं। तीन माह में इस सोसाइटी पर 26 सितंबर और 11 अक्टूवर को एक-एक गाड़ी डीएपी मिली थी। इसके बाद आज तक एक भी गाड़ी डीएपी नहीं आई। किसान समिति पर पहुंचते हैं तो सचिव आज कल में खाद की गाड़ी आने की कहकर टाल देते हैं।