मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के हलफनामे पर महिलाओं की अलग-अलग राय है। किसी ने कहा कि मस्जिद में महिलाओं को नमाज पढ़ने की आजादी है। उन्हें याची की याचिका पर आपत्ति है, जबकि दूसरी ने मस्जिद में जाने से रोकने का आरोप लगाया है। जमात से नमाज न पढ़ने की एक लकीर खींच दी गई है। बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे में कहा था कि महिलाएं जमात के साथ नमाज अदा कर सकती हैं।
हमारी मां-बहनों और बेटियों को मस्जिद में जमात के साथ नमाज पढ़ने का पूरा हक है। जब बेटियां पुलिस, फौज में पुरुषों के बराबर काम कर रही हैं, तो मस्जिदों में नमाज क्यों नहीं पढ़ सकतीं। बाजार में अगर मुस्लिम महिलाएं खरीदारी करने जाती हैं और अजान होने लगे, तो मस्जिद में नमाज पढ़ लेंगी तो कजा नहीं होगी। कुछ जिहादी मानसिकता के लोग रोक रहे हैं।
-रूबी आसिफ खान, भाजपा नेता
मैं दावे से कह सकती हूं कि जितने हक महिलाओं के इस्लाम में हैं, उतने कहीं नहीं होंगे। मस्जिदों में नमाज पढ़ने की पाबंदी कभी नहीं थी। मुझे सुप्रीम कोर्ट में उस याची पर आपत्ति दी है, जो कोर्ट का समय ऐसी बातों से खराब कर रहा है, जिसका काेई मकसद नहीं है। अगर उसे देना है तो रोजगार, थर्ड डिग्री यातना, कैदियों की बीमारियों को लेकर याचिका दे।
-मारिया आलम, वरिष्ठ समाजसेवी
महिलाओं के मस्जिद में नमाज पढ़ने पर कोई पाबंदी नहीं है। महिला और पुरुष की जमात अलग-अलग हो सकती है, जिसमें पर्दा का माकूल इंतजाम होना चाहिए।
-मुफ्ती जाहिद अली खान, पूर्व अध्यक्ष, सुन्नी थियोलॉजी विभाग एएमयू