भारत में न्यूक्लियर एनर्जी का उपयोग अब मेडिसिन और फूड प्रिजर्वेशन (खाद्य संरक्षण) के क्षेत्र में बहुत व्यापक स्तर पर हो रहा है। खासतौर से त्वचा कैंसर के इलाज के लिए इसको लेकर बहुत ही एडवांसमेंट (उन्नति) हुए हैं। यह बात भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर, मुंबई के परमाणु भौतिकी विभाग के प्रमुख प्रो. बीके नायक ने सोमवार को अमर उजाला से खास बातचीत में कहीं। वे एएमयू में भौतिक विभाग की परमाणु संरचना और परमाणु अभिक्रियाएं विषय पर हो रही तीन दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार में पहले दिन बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए।
उन्होंने कहा कि स्किन कैंसर में गामा किरणों का उपयोग किया जाता है। इसमें कैंसर की कोशिकाओं के साथ-साथ स्वस्थ कोशिकाएं भी नष्ट हो जाती हैं, लेकिन अब न्यूक्लियर एनर्जी के उपयोग से एसलारेस बेस्ड (इसमें प्रोटोन और कार्बन को चुन लिया जाता है) प्रक्रिया से केवल कैंसर युक्त कोशिकाओं को ही हटाया जा सकता है। यह मेडिसिन जगत में न्यूक्लियर एनर्जी की बड़ी उपलब्धि है।
इसके अलावा न्यूक्लियर एनर्जी का बड़ा इस्तेमाल फूड प्रिजर्वेशन के लिए भी किया जा रहा है। बीजों को कम समय में पैदावार के लिए तैयार किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इन बीजों को रोग रहित करने और रोगों की चपेट में न आने की सबसे कम संभावना तक लाने के लिए तैयार किया जा रहा है। उदाहरण के लिए आलू में ही एक किल्ला फूट जाने से उसका बीज उपयोगी नहीं रहता है, लेकिन इस तकनीक से बीज को सबसे उन्नत स्थिति में रखा जा रहा है। भारत में इसका उपयोग बड़े पैमाने पर हो रहा है। इंडस्ट्री सेक्टर में न्यूक्लियर एनर्जी के इस्तेमाल की बात करें तो अभी भारत में यह अपनी जरूरत का चार फीसद है।
प्रो. नायक ने कहा कि भविष्य में सोलर एनर्जी एक बड़ा स्वरूप लेने वाली है। भारत में ऊर्जा संबंधी जरूरत न्यूक्लियर के साथ-साथ विंड एनर्जी, सोलर एनर्जी, हाइड्रो (जल) एनर्जी से भी पूरी होगी। कोयले का प्रयोग सबसे कम करने की ओर कदम बढ़ाए जा रहे हैं। न्यूक्लियर रेडिएशन के सवाल पर उन्होंने कहा कि अगर हम नियंत्रित स्तर तक इसका उपयोग करते हैं, तो यह बिल्कुल भी हानिकारक नहीं है।