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सर सैयद ने घुंघरू बांध नुमाइश में किया था नाटक का मंचन

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डॉ. राहत अबरार एएमयू के इतिहास के मामलों के जानकार - फोटो : CITY OFFICE
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दीपक शर्मा
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शुक्रवार से विधिवत रूप से शुरू हो रही अलीगढ़ की राजकीय औद्योगिक एवं कृषि प्रदर्शनी में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद खान ने अपने पैरों में घुंघरू बांध कर नाट्य मंचन किया था। उन्होंने अपने मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज के लिए फंड इकट्ठा करने के लिए मंचन किया था और उस समय उनके इस कार्य की कट्टरपंथी विचार धारा के लोगों ने कड़ी आलोचना की थी।
एएमयू के इतिहास के मामलों के जानकार डॉ. राहत अबरार कहते हैं, दस्तावेजों में जिक्र मिलता है कि 6 फरवरी 1894 को सर सैयद अहमद ने अपने साथियों के साथ नाटक का मंचन किया था, जो समाज में जागरूकता फैलाने और शिक्षा के प्रति बढ़ावा देने पर केंद्रित था। दस्तावेज में इस बात का भी जिक्र है कि सर सैयद के मित्रों ने नाट्य मंचन को लेकर अपनी-अपनी आशंकाएं भी जाहिर की थीं। एक जगह लिखा है, ‘लोग हमें थिएटर वाला कहकर हमारा मजाक उड़ाएंगे, जो हमारे विरोधी अखबार वाले हैं, वह हमारी हंसी उड़ाएंगे। सर सैयद कहते हैं, अगर मैं लोगों का ख्याल करता तो अब तक जो कुछ कर पाया हूं, वह भी न कर पाता। जो बकते हैं, उनको बकवास करने दो। उनकी परवाह क्या करनी।’
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इसके बाद थिएटर की तैयारियां शुरू हुईं। बड़े-बड़े शामियाने और कनातें लगाकर कौमी थिएटर बनाया गया। थिएटर के लिए टिकट की व्यवस्था की गई थी। इस टिकट के पैसों से मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज में पढ़ने वाले गरीब छात्रों की मदद की जानी थी। रात 8:45 बजे नाटक का मंचन शुरू हुआ। बाबू फिदा हुसैन ने हारमोनियम पर धुन बजानी शुरू की और लोगों का आना शुरू हो गया। आने वाले लोगों के लिए दर्जा तय था, जिसका जो दर्जा था, वह वहीं पर बैठा। पहले सीन में हाजी मोहम्मद इस्माइल रईस दतावली कप्तान की भूमिका में मंच पर नजर आए। इसके बाद एक-एक करके 12 सिपाही मंच पर हाजिर हुए। दूसरे सीन में सर सैयद अरबी चोगा पहने हुए मंच पर आए और कप्तान ने उनसे कुछ गुफ्तगू की। इस तरह एक कामयाब मंचन संपन्न हुआ।
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मंचन में विदेशी पर्यटक व तत्कालीन अधिकारी भी शामिल हुए थे
सर सैयद के इस नाट्य मंचन में तत्कालीन कलेक्टर मिस्टर कैनेडी और उस समय के सिविल सर्जन डॉक्टर वोरियार्टी भी शामिल हुए। कलेक्टर का कहना था कि कॉलेज के लिए फंड इकट्ठा करने के काम से मैं स्वयं को दूर रखना ठीक नहीं समझता। इसके अलावा उस समय ईरान से आए पर्यटक आगा कमालउद्दीन संजर और अफगानिस्तान से आए पर्यटक आगा मोहम्मद हुसैन भी नाटक में शामिल हुए। अलीगढ़ के उस समय के मशहूर रईस ख्वाजा मोहम्मद यूसुफ भी नाटक में शामिल हुए। इनके नाम पर ही अलीगढ़ में ख्वाजा चौक है।
नाटक के अंत में सर सैयद मंच पर आते हैं और ये पंक्तियां कहते हैं
दोस्तों क्या तुम्हें सचमुच था थिएटर का यकीं
क्या वह समझे थे कि पर्दा कोई होगा रंगी
नजर आएगी जो सोई हुई एक जोहराजबीं
आएगा फूल के लिए इरमा का गुलचीन
कौम के ख्वाब ए पोशा कि यह ताबीर है
एक्टर यह नहीं इबरत की यह तस्वीर है
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