सासनी क्षेत्र में पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित उदय सिंह की कचहरी को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा। पर्यटन निदेशालय की ओर से इस स्थल पर पर्यटन विभाग की ओर से कार्य कराए जाने के लिए कार्ययोजना में शामिल कर लिया गया है। इसे लेकर पर्यटन विभाग, कार्यदायी संस्था व पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने स्थलीय निरीक्षण कर सीमांकन भी कर लिया है।
सासनी में राजा उदय सिंह की कचहरी के नाम से पौराणिक स्थल है। इस स्थल को राज्य पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित स्थलों में शामिल कर रखा है। यह कचहरी अब खंडहर का रूप ले चुकी है। इस खण्हर के अब जल्द ही दिन बहुरेंगे। विधायक सदर अंजुला सिंह माहौर द्वारा इस स्थल को पौराणिक दृष्टि से विकसित कराने के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया था। इस प्रस्ताव पर पर्यटन विभाग की ओर से कार्ययोजना में शामिल कर लिया गया है।
इसके तहत अब इस स्थल को पर्यटक स्थल के रुप में विकसित करने को लेकर विभाग की ओर से खाका खींचा जा रहा है। पर्यटन विभाग की ओर से कार्यदायी संस्था के माध्यम से स्थल का निरीक्षण कर सीमांकन की कार्रवाई भी पूरी कर ली गई है। धनराशि के स्वीकृत होते ही उक्त स्थल पर यात्री सुविधाओं के साथ ही स्थल के प्रचार प्रसार की व्यवस्था भी की जाएगी, जिससे पर्यटकों को बढ़ावा मिल सके।
विभाग की ओर से उदय सिंह की कचहरी को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए कार्ययोजना में शामिल कर लिया गया है। इसके तहत इस पौराणिक स्थल पर विभिन्न कार्य कराए जाएंगे। सर्वे का कार्य हो चुका है।
विशाल श्रीवास्तव, जिला पर्यटन सूचना अधिकारी
उदय सिंह की कचहरी का इतिहास
यह क्षेत्र पांडववंशी ठेनुआं जाटों के अधीन था। जाट राजा पहुप सिंह ने यहां एक किला बनवाया था। ठेनुआं जाट राजाओं ने किले की सुरक्षा के लिए सिकंदराराऊ व सासनी के आसपास छोटी-छोटी किले की गढ़ी बनवाई थी, जिसमें गढ़ी बीरबल, गढ़ी कचौरा, गढ़ी बिजैगढ़ प्रसिद्ध थी। इस किले का इतिहास करीब 300 साल से ज्यादा पुराना है। बताया जाता है कि राजा उदय सिंह यहां आकर कचहरी लगाकर आपसी विवाद के फैसलों की सुनवाई करते थे। यहां तक कि ज्यादातर मामलों में सुलह कराया जाता था। उदय सिंह की कचहरी को पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित कर लिया गया है।