स्व. केपी सिंह मेमोरियल ट्रस्ट की ओर से एएमयू के एनआरएससी क्लब में शनिवार शाम ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ विषय पर व्याख्यान हुआ। ट्रस्ट की ओर से पहली बार डॉक्यूमेंट्री फिल्म और सिनेमा पर तुलनात्मक चर्चा हुई। कारण ये कि अब सोशल मीडिया और शार्ट फिल्मों के दौर में साहित्यकार भी इस दिशा में आगे क्याें न बढ़े..? वह भी तब जब शार्ट फिल्में साहित्य से ज्यादा प्रभावशाली हो गई हैं।
कार्यक्रम में 80 के दशक में कैमरा, साउंड और रील से बनने वाली फिल्मों को बनाने में होने वाली दिक्कतों की तुलना आज के युग में स्मार्ट फोन से बनने वाली शार्ट फिल्मों से हुई, जिसे कोई भी बहुत आसानी से बना सकता है।
मुख्य अतिथि डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर संजय जोशी ने प्रोजेक्टर पर कुछ पुरानी फिल्में दिखाईं। आनंद पटवर्धन, मंजा दत्ता, रीना मोहन, सुहासिनी मुले, वसुधा जोशी जैसे नामचीन डॉक्यूमेंट्री फिल्मों पर बात हुई।
उन्होंने बांबे अवर सिटी, वॉर एंड पीस, राम के नाम सहित कुछ अन्य फिल्मों को दिखाया और उनके सामाजिक विमर्श को भी बताया।
डॉ. नमिता सिंह ने कहा कि स्व. केपी सिंह के पुराने साथी राही मासूम रजा कहा करते थे कि साहित्य और सिनेमा को कोर्स में शामिल करना चाहिए ताकि इन दो सबसे प्रभावशाली विधाओं से जनता के मुद्दों को और प्रमुखता के साथ उठाया जा सके। उन्होंने ताउम्र इसकी वकालत की। डॉ. नमिता सिंह ने कहा कि कला केवल मनोरंजन नहीं है।
कला समाज की समस्याओं को बेहतर ढंग से उठाने और उसकी आवाज बन कर समाधान कराने का भी सशक्त माध्यम है। व्याख्यान में उर्दू के जानेमाने साहित्यकार पद्मश्री काजी अब्दुल सत्तार, कथाकार प्रेमकुमार, साहित्यकार वेद प्रकाश अमिताभ, एएमयू के अंग्रेजी विभाग की डॉ. समीना खान, पर्यावरण विद सुबोध नंदन शर्मा, शंभूनाथ तिवारी, देवेंद्र गुप्ता, अमीय मोहन सहित कई लोग मौजूद रहे। सभी ने इस पहल की सरहना की।
कार्यक्रम की अध्यक्ष एएमयू के मास मीडिया विभाग के शाफे किदवई ने की। इस मौके पर ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष राजीव लोचननाथ शुक्ला ने अतिथियों को धन्यवाद दिया तो बेहद सधी हुई आवाज में सुस्पष्ट एवं प्रशंसनीय संचालन के लिए समिता सिंह को भी बधाई मिली।