पुरानों से छीनकर नए सदस्यों को प्लाटों के पट्टे किए जाने लगे। तब करीब दस वर्ष पहले आवंटियों ने संघर्ष समित बनाई व उसका पंजीकरण कराया। समिति ने सिविल न्यायालय में मुकदमा दायर कर दिया। आवंटियों को राहत नहीं मिली। पिछले वर्ष जून माह में संघर्ष समिति पदाधिकारी सीएम के जनता दरबार में पहुंचे। वहां बात रखी, तब एसआईटी जांच का निर्देश हुआ।
मैं इस लड़ाई को लड़ रही संघर्ष समिति का संरक्षक हूं। जिसमें कई पदाधिकारी व 750 सदस्य हैं। समिति द्वारा किए गए बंदरबाट के खिलाफ लड़ाई आखिरी सांस तक लड़ेंगे। अब तक जो कुछ हुआ, वह सियासी मिलीभगत से हुआ है।-निगम सागर दीक्षित, सेवानिवृत्त निरीक्षक
पूरे मामले की जांच को गठित एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट शासन को भेज दी है। अब आगे की कार्रवाई वहीं से तय होगी।-संगीता सिंह, मंडलायुक्त
एक मुकदमा हुआ दर्ज, पर लगी एफआर
समिति द्वारा पार्क की भूमि पर प्लाटों के पट्टे किए जाने पर एक मुकदमा क्वार्सी थाने में दर्ज कराया गया। मगर सियासी दखल के चलते उसमें एफआर लगा दी गई। अब संघर्ष समिति उस एफआर के खिलाफ अदालत में भी लड़ रही है।
1988 में अस्तित्व में आई राज्य कर्मचारी विकास लोक सहकारी आवास समिति में 2005 के पहले तक नियम था कि सिर्फ राज्यकर्मी या पेंशनर परिवारों को ही सदस्यता मिलेगी। उन्हीं को आवेदन करने पर 200-200 वर्ग गज के प्लॉट पट्टे के जरिये आवंटित किए जाएंगे। मगर 2005 में सियासी गठजोड़ से आवास विकास परिषद में सांठगांठ कर समिति पदाधिकारियों ने नियम में संशोधन कराया कि बाहरियों को भी सदस्य बनाया जा सकेगा। इसी बदलाव के बाद असदपुर साइट में 750 प्लाटों के सापेक्ष 35000 सदस्य बना दिए गए।
इस तरह से किए पट्टे
पहले समिति ने एक दर्जन किसानों से इकरारनामा कर असल आवंटियों को प्लॉट आवंटित कर दिए। उन्होंने नीव भरवा दीं। बाद में समिति ने गोलमाल शुरू किया। किसानों से फिर नया इकरारनामा कराया। उसके सहारे नए लोगों को प्लाटों पर पट्टे किए गए। इस ऐवज में नए लोगों से पट्टा करते समय जो रकम ली गई, उसका कुछ फीसदी हिस्सा किसानों को भी दिया। बाकी रकम का खुद बंदरबाट किया।