सिंचाई विभाग का न्यायालय, विभाग द्वारा जारी नया रोस्टर
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नहर में थूकना भी अपराध
शायद आपको पता न हो, लेकिन जल निकास अधिनियम-1873 के तहत नहर, रजबहा और माइनर में थूकना तक अपराध की श्रेणी में हैं। इसका बाकायदा मुकदमा दर्ज किया जा सकता है। इसके अलावा नहरों को प्रदूषित करने, कचरा डालने, कुलावा लगाने, कट लगाने, बंधा बनाने या सरकारी जमीन पर बुर्जी बिटौरे बनाने से संबंधित मामलों की सुनवाई उक्त अधिनियम में होती है। दोषी पाए जाने पर छह महीने की कैद, 5,000 से लेकर 50,000 तक जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। शुरुआती दौर में जुर्माने की रकम 100 रुपये थी।
ऐसे होती है सुनवाई
- उत्तरी भारत नहर और जल निकास अधिनियम-1873 के अंतर्गत स्पेशल जूडिशियल मजिस्ट्रेट (उप राजस्व अधिकारी) प्रथम एवं द्वितीय की दो अदालतों में वर्तमान में लगभग 120 मामलों की सुनवाई हो रही है।
- सींचपाल शिकायत दर्ज करते हैं, जिलेदार जांचकर साक्ष्य जुटाते हैं। एई बताते हैं कि मुकदमा हो या नहीं, एक्सईएन मुकदमे की स्वीकृति देते हैं। स्पेशल जूडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में सुनवाई होती है।
- यदि जुर्माना लगाया जाता है, तो उसे भू-राजस्व (लैंड रेवेन्यू) की तरह वसूल किया जाता है। संबंधित आरोपी अपने वकील के माध्यम से अपना पक्ष रखते हैं।
कैनाल एक्ट-1873 में चल रहे नौ मामले
सिंचाई विभाग में कैनाल एक्ट-1873 भी हैं। इसके तहत सरकारी नलकूपों के आसपास बुर्जी बिटौरे बनाने और जमीन पर कब्जा करने के मामलों की सुनवाई होती है। अलीगढ़ के नलकूप खंड प्रथम में 520 और खंड द्वितीय में 343 सरकारी नलकूप हैं। स्पेशल जूडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में ऐसे नौ मामलों की सुनवाई हो रही है।