कार्यक्रम को संबोधित करते पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णनन।
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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एवं राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष केजी बालाकृष्णन ने कहा कि हमारी जेलों में बंद लोगों में 67.5 प्रतिशत संख्या ऐसे लोगों की है जो विचाराधीन कैदी हैं तथा उनके मुकदमे विभिन्न न्यायालयों में लंबित हैं। देश में शीघ्र न्याय की प्रभावी व्यवस्था को विकसित करने की आवश्यकता है।
न्यायमूर्ति बालाकृष्णन मंगलवार को एएमयू के राजनीति विज्ञान विभाग द्वारा यूनिवर्सिटी पॉलीटेक्निक सभागार में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि न्यायिक व्यवस्था को तेज गति प्रदान किया जाना चाहिए ताकि लोगों को समय पर न्याय मिल सके। किसी भी मुकदमे में आरोपों की सुनवाई दो वर्ष के अंदर प्रारंभ हो जानी चाहिए ताकि दोषी होने या न होने का शीघ्र निर्णय हो जाए तथा समाज को असली अपराधियों से राहत प्राप्त हो।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सिविल मामलों में भी मुकदमे बहुत लंबे चलते हैं जिससे लोगों के अधिकार मारे जाते हैं तथा कुनबों का जीवन नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है। उन्होंने न्याय तथा न्यायालय व्यवस्था में खाली पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरे जाने की वकालत की। न्यायमूर्ति बालाकृष्णन ने छात्र व छात्राओं से आह्वान किया कि वह कठोर परिश्रम करें। मायूसी को अपने पास न आने दें तथा प्रत्येक अवसर का उचित प्रयोग करें क्योंकि विश्व के बदलते हुए परिदृश्य में भारत का भविष्य उज्ज्वल है।
जेएनयू के सेवानिवृत्त प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि हम आज दौलत तथा सत्ता के बीच खतरनाक मिलीभगत देख रहे हैं जो हमारी स्वतंत्रता तथा न्याय के लिए खतरे की घंटी है। उन्होंने स्वतंत्र एवं निष्पक्ष मीडिया के अस्तित्व को महत्वपूर्ण बनाने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं की सलामती तथा कमजोरों के अधिकारों की सुरक्षा पर बल दिया। प्रो. निगार जुबैरी ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालन प्रो. असमर बेग एवं प्रो. अब्दुर रहीम पी वीजापुर ने आभार व्यक्त किया।