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सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास नारे को विश्वसनीय साबित करने पर रहा जोर

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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष समारोह में वर्चुअल मीटिंग में संबोधित करते प्रधा? - फोटो : CITY OFFICE
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अभिषेक शर्मा, अलीगढ़।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष समारोह में बतौर मुख्य अतिथि ऑनलाइन संबोधन मंगलवार को बिना किसी विवाद के पूरा हो गया। हालांकि कार्यक्रम तय होने के बाद से ही तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं अलीग बिरादरी की ओर से आ रही थीं। मगर, प्रधानमंत्री का संबोधन सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास नारे को विश्वसनीय साबित करने पर केंद्रित रहा।
इस दौरान उन्होंने छह साल में पहली बार अलीग बिरादरी से सुझाव मांगते हुए देशभर के अल्पसंख्यकों को जोड़ने का प्रयास किया और सभी विरोधी प्रतिक्रियाओं को दरकिनार दिया। हां, इसके कुछ सियासी मायने जरूर निकाले जा रहे हैं। माना जा रहा है कि अरब देशों में बड़े ओहदेदार अलीगों से बेहतर रिश्ते कायम करने और पश्चिम बंगाल चुनाव से ऐन पहले पीएम मोदी ने खुद अपनी और सरकार की मुस्लिम उदारवादी छवि पेश की है।
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यह बात जगजाहिर है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी व उनकी सरकार ने कई मुद्दों पर देश में मुस्लिम समाज का विरोध झेला है। यह विरोध आज भी बरकरार है। चाहे कश्मीर मुद्दा रहा हो या सीएए-एनआरसी का कानून रहा हो। तीन तलाक का मुद्दा भी इसी कड़ी में शामिल रहा है। इस सबके बीच मोदी का एएमयू के शताब्दी वर्ष में संबोधन तय होने के बाद से विरोध के स्वर भी उठे थे। हालांकि, खुद एएमयू इंतजामिया और जिला पुलिस प्रशासन के प्रबंधन ने विरोध होने से पहले ही थाम दिया। मंगलवार को आयोजन के दिन कहीं किसी तरह के विरोध या विवाद की खबर सुनने-देखने को नहीं मिली।
अब बात अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एएमयू के आयोजन में दिए गए संबोधन पर करें तो उनका 32 मिनट का भाषण बेहद संतुलित रहा। किसी तरह का विवाद, किसी तरह के तर्क, एएमयू के किसी विवादित मुद्दे की झलक उनके भाषण में नहीं दिखाई दी। उनके भाषण की शुरुआत एएमयू के गौरवशाली इतिहास से शुरू हुई और खुद की सरकार द्वारा मुस्लिमों के लिए उठाए गए कदमों से होते हुए देश के विकास, राष्ट्रवादी विचारधारा, महिला शिक्षा, आत्मनिर्भर भारत के रास्ते एएमयू छात्रों को लक्ष्य देने पर खत्म हुई।
इस दौरान उन्होंने अपने नारे सबका साथ, सबका विकास व सबका विश्वास को और विश्वसनीय बनाने के लिए एएमयू के सहारे देश के अल्पसंख्यकों को जोड़ने की कोशिश की। साथ ही छात्रों को लक्ष्य दिया कि वे कुछ ऐसा करें जिससे आजादी के सौ वर्ष का समारोह मनाते समय हम गौरवशाली उपलब्धियों का गुणगान फक्र के साथ कर सकें। खास बात यह कि उनके भाषण ने उन लोगों को एक सबक दिया है, जो छोटी-छोटी बातों पर एएमयू को निशाने पर लेते हैं। उन लोगों को सबक देते हुए उन्होंने कहा कि समाज में हर तरह के व्यक्ति होते हैं।
मगर नकारात्मक सोच रखने वालों की संख्या बेहद कम होती है। इसलिए हम विकास के राह पर ऐसे आगे बढ़ें कि नकारात्मक सोच रखने वालों का दायरा खुद ही सिमट जाए। इस बीच उन्होंने एएमयू चांसलर सैयदना मफारुल सैफुद्दीन से अपने रिश्तों का जिक्र किया। देश में एएमयू के केंद्रों की बात कही। यह कहकर उन्होंने अपनी व सरकार की मुस्लिम उदारवादी छवि पेश करने का प्रयास किया।
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इन तीन मुद्दों से दूर रहे पीएम मोदी
- सीएए-एनआरसी : केंद्र सरकार द्वारा सीएए-एनआरसी कानून लागू किए जाने पर एएमयू में बवाल हुआ और इस बवाल की चिंगारी देश भर में फैली थी।
- अल्पसंख्यक स्वरूप : एएमयू को अल्पसंख्यक स्वरूप का दर्जा दिलाने की मांग लगातार अलीग बिरादरी द्वारा की जा रही है, प्रकरण सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
- जिन्ना की तस्वीर: जिन्ना की एएमयू यूनियन हॉल में तस्वीर को लेकर बवाल हुआ और देश दुनिया की सुर्खियों में रहा।
- एएमयू के आयोजन में बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन बेहद संतुलित और कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण रहा। मगर, एएमयू से जुड़े अहम मुद्दों से वे दूर रहे, जिनमें एएमयू के अल्पसंख्यक स्वरूप का मुद्दा सबसे अहम था। हमें उम्मीद है कि एएमयू कुलपति ने जो प्रस्ताव उनके समक्ष रखे हैं, उन पर काम होगा। बात अगर मुस्लिम सबका साथ, सबका विकास व सबका विश्वास छवि की करें तो यह तभी माना जा सकता है, जब कथनी व करनी में फर्क न दिखाई दे। देश को एक सूत्र में पिरो कर सभी का विकास किया जाए। इस भाषण के अपने-अपने असर माने जा रहे हैं। मगर हां, इतना जरूर है कि उन लोगों को यह भाषण सबक है जो छोटी-छोटी बातों पर एएमयू को निशाना बनाते हैं। -सैय्यद माजिन जैदी पूर्व उपाध्यक्ष एएमयू छात्रसंघ
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