सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने सहित अन्य मांगों को लेकर एएमयू के जेएन मेडिकल कॉलेज के जूनियर डॉक्टरों की 24 घंटे की हड़ताल से स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई हैं। सर्वाधिक इमरजेंसी सेवाएं प्रभावित हुईं। दर्द से तड़पते मरीजों को इमरजेंसी गेट से लौटा दिया गया। वहीं एएमयू के छात्रों एवं कर्मचारियों के उपचार में कोई कोताही नहीं बरती गई।
आरडीए के आह्वान पर हड़ताल में करीब 400 जूनियर डॉक्टर काम से अलग रहे। कुछ आए तो उन्हें आरडीए पदाधिकारियों ने समझा-बुझाकर वापस भेज दिया। इसकी वजह से जेएन मेडिकल कॉलेज प्रशासन का इमरजेंसी प्लान पूरी तरह सफल नहीं हो सका। ओपीडी, ऑपरेशन एवं कक्षाएं तो अवश्य चलीं, लेकिन इमरजेंसी सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं।
ओपीडी एवं ऑपरेशन भी अन्य दिनों की तुलना में कम रहे। हड़ताल से अंजान दूर-दूर के मरीज एवं उनके परिजन मेडिकल कॉलेज के इमरजेंसी में पहुंचे, लेकिन सुरक्षाकर्मियों ने गेट से ही उन्हें वापस कर दिया। कुछ तीमारदार तो सुरक्षाकर्मियों के सामने अल्लाह का वास्ता देकर गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था।
दोपहर तक पहुंचे अधिकतर मरीजों को वापस कर दिया गया। इससे पूर्व सुबह आठ बजे से जूनियर डॉक्टरों (रेजीडेंट डॉक्टर) की 24 घंटे की हड़ताल शुरू हुई। कई विभागों में जूनियर डॉक्टर पहुंचे थे, लेकिन आरडीए अध्यक्ष डॉ. अब्दुल्लाह एवं अन्य नेताओं के पहुंचने एवं समझाने के बाद वापस चले गए।
आरडीए नेता सुबह से ही विभिन्न विभागों का चक्कर लगाकर जूनियर डॉक्टरों को काम करने से मना कर रहे थे। हालांकि इसके बावजूद स्त्री एवं प्रसूति रोग एवं ईएनटी सहित कुछ विभाग में जूनियर रेजीडेंट (डॉक्टर) काम करते देखे गए। डॉ. अब्दुल्लाह का आरोप है कि कॉलेज प्रशासन के भय से कुछ डॉक्टर काम करने को मजबूर हुए। उन्होंने कहा कि कॉलेज प्रशासन द्वारा इमरजेंसी में सीनियर रेजीडेंट एवं सीएमओ आदि की ड्यूटी लगाने की बात कही गई थी, लेकिन हड़ताल के दौरान उनकी ड्यूटी नहीं लगाई गई, इसलिए इमरजेंसी से मरीजों को लौटाया गया। डॉ. अब्दुल्लाह ने कहा कि कॉलेज प्रशासन को जूनियर डॉक्टरों की अहमियत का अंदाजा लग गया होगा।
प्राचार्य का बयान.....
जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल का आंशिक असर रहा। ओपीडी में औसतन 3,200 मरीज आते है। हड़ताल के दिन 2,633 पर्चे बने हैं। वहीं औसतन 35-40 के बदले सोमवार को करीब 23 ऑपरेशन हुए हैं। अन्य दिनों की तरह कक्षाएं भी संचालित हुई। इमरजेंसी में दो बजे के बाद डॉक्टरों की ड्यूटी लगायी गई। सुबह के मरीजों को ओपीडी में भेजा गया था। दो बजे के बाद इमरजेंसी सेवाएं सुचारु रूप से संचालित हो रही है। जेएन मेडिकल कॉलेज में 35 विभाग है। करीब 22 क्लीनिकल विभाग के कई लड़के काम पर आए थे। मरीजों को नजरअंदाज नहीं किया गया।
-प्रो. एससी शर्मा, प्रिंसिपल, जेएन मेडिकल कॉलेज
16 दिन से धरना एवं 6 दिन से क्रमिक भूख हड़ताल चल रही है। कोई बात करने तक नहीं आया। पहले ही चेतावनी दे चुके थे कि मांगे पूरी नहीं हुई तो सोमवार को 24 घंटे के लिए जूनियर डॉक्टर काम से दूर रहकर हड़ताल करेंगे। आज मरीजों को जो भी परेशानी हो रही है, उसके लिए कॉलेज प्रशासन जिम्मेदार है। हमारे अधिकारी सिर्फ सातवें वेतन आयोग को हाईलाइट कर रहे हैं, जबकि हमारी मांगों में 27 मुद्दे शामिल है। इमरजेंसी में कोई सीएमओ नहीं है, जबकि कॉलेज प्रशासन द्वारा कहा गया था कि यहां ड्यूटी लगाई जाएगी।
-डॉ. अब्दुल्लाह आजमी, अध्यक्ष आरडीए
डिबाई का परिवार रोते हुए लौटा
फूड प्वाइजनिंग से पीड़ित डिबाई के एक ही परिवार के तीन लोग एवं उनके परिजन रोते होते जेएन मेडिकल कॉलेज से वापस लौटे।
कांति प्रसाद (करीब 60 वर्ष), उनकी पत्नी यमुना देवी एवं बहू घर में भोजन करने के बाद फूड प्वाइजनिंग की शिकार हो गई। परिजन आनन-फानन उनको लेकर जेएन मेडिकल कॉलेज पहुंचे। सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें हड़ताल का हवाला देकर गेट से ही बाहर का रास्ता दिखा दिया। हाथ जोड़कर परिजन उपचार के लिए याचना करते रहे, लेकिन किसी ने नहीं ध्यान दिया। कुछ ऐसा ही वाकया शाहजमाल नीवरी निवासी बुजुर्ग मुंशी खान एवं उनके परिजनों के साथ हुआ। मुंशी खान को घबराहट एवं बेचैनी होने पर परिजन जेएन मेडिकल कॉलेज लेकर आए थे। अल्लाह का वास्ता देकर उपचार की गुहार लगाते रहे, लेकिन किसी ने नहीं सुना और वापस कर दिया।