यूजीसी अधिनियम 2010 एएमयू के लिए बवाल-ए-जान से कम नहीं है। इसी को आधार बनाकर इलाहाबाद हाई कोर्ट में कुलपति जमीरउद्दीन शाह की नियुक्ति को चुनौती दी गई थी। फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। यूजीसी अधिनियम 2010 के क्लाज 7.3.0 के अनुसार केंद्रीय विश्वविद्यालय का कुलपति बनने के लिए दस वर्ष का प्रोफेसर का अनुभव जरूरी है।
कुलपति का पैनल सर्च कमेटी द्वारा बनाई जाएगी। सुप्रीम कोर्ट में 8 अप्रैल 2016 को सुनवाई होने वाली है। दिलचस्प बात यह है कि एएमयू ईसी की विशेष बैठक 2 अप्रैल एवं कोर्ट की विशेष बैठक 7 अप्रैल को निश्चित किया गया है।
यानी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की तिथि से पहले ही नए वीसी का पैनल फाइनल कर राष्ट्रपति के पास भेज दिया जाएगा। गौर करने की बात है कि पहले ईसी की बैठक 19 एवं एएमयू कोर्ट की बैठक 20 मार्च को होनी थी। लेकिन विरोध एवं राष्ट्रपति तथा केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी से शिकायत के बाद कोर्ट की बैठक की तिथि 20 मार्च से बढ़ाकर 16 अप्रैल कर दिया गया था। अब एएमयू ईसी एवं कोर्ट की बैठक 8 अप्रैल से पहले कराने के निर्णय के बाद लोग इसका अर्थ निकालने में जुटे है। कुछ लोग ईसी के फैसले को भी इससे जोड़ कर देख रहे है।
ऐसे लोगों का कहना था कि हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान एएमयू की तरफ से कहा गया है कि वह यूजीसी अधिनियम 2010 को एडप्ट नहीं किया है और यूजीसी अधिनियम के अनुसार पैनल बनने पर नई परेशानी हो सकती है। कानून के जानकार लोग कह रहे है कि ईसी एवं कोर्ट की बैठक के बीच पर्याप्त समय होना चाहिए।
इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि पैनल बनने के बाद नाम कोर्ट में जाता है। प्रस्तावित नामों के बारे में जानकारी हासिल करने एवं विचार करने के लिए कोर्ट सदस्यों के पास पर्याप्त समय होना चाहिए ताकि योग्य व्यक्ति का चुनाव हो सके। एएमयू कोर्ट सदस्य खुर्शीद अहमद खान का कहना है कि 11 जून को एएमयू कोर्ट द्वारा ईसी में निर्वाचित छह सदस्यों का कार्यकाल पूरा हो रहा है।
ये सभी एएमयू से बाहर के होते है और इंतजामिया के प्रभाव से मुक्त होते है। इसके अतिरिक्त जून तक 42 कोर्ट सदस्यों का कार्यकाल खत्म हो रहा है। ज्यादा अच्छा होता कि नए ईसी एवं कोर्ट सदस्यों का चुनाव होने के बाद पैनल बनता। वहीं कुछ लोग एक बार फिर एएमयू का मामला न्यायालय में पहुंचने की आशंका जता रहे है। ऐसे लोगों का कहना है कि यूजीसी अधिनियम 2010 केंद्रीय विश्वविद्यालय को मानना बाध्यकारी एवं अनिवार्य है।