मौसम में बदलाव के साथ ही पर्यावरण प्रदूषण से कौओं के अस्तित्व पर संकट है। श्राद्ध पक्ष शुरू होते ही कौओं की तलाश शुरू हो जाती है। ऐसी मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष में कौओं को भोजन कराने से वह पितरों तक पहुंचता है।
कौआ किसानों का मित्र है। रासायनिक खादों, कीटनाशक दवाओं, शहरीकरण और पर्यावरण प्रदूषण के कारण शहरी क्षेत्र में कौओं की संख्या घट रही है। पर्यावरणविद् सुबोध नंदन का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण एवं प्रकृति को संतुलित रखने में कौओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वन विभाग के पास कौओं के संरक्षण के लिए कोई उपाय नहीं हैं। चील, गिद्ध, गौरैया, सारस के साथ ही कौए भी विलुप्त होते जा रहे हैं। प्रदूषण का असर हर किसी पर पड़ा है। मेहमानों के घर आगमन की सूचना देने वाले कौओं की कांव-कांव और गौरैया की चहक गुम सी हो गई है।