फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अब मशीन नापेगी घटिया सड़क का भ्रष्टाचार

Fri, 14 Apr 2017 02:03 AM IST
आशीष निगम
विज्ञापन
विज्ञापन
पीडब्ल्यूडी से बनने वाली सड़कों की गुणवत्ता को परखने के लिए अब आधुनिक तकनीक इस्तेमाल होगी। अलीगढ़ पीडब्ल्यूडी कार्यालय आठ लाख की लागत से न्यूक्लियर गेज टेस्टिंग मशीन खरीदने जा रहा है। पीडब्ल्यूडी के प्रमुख सचिव सदाकांत ने निर्देश जारी कर दिए हैं।
विज्ञापन


पीडब्ल्यूडी के 235 डिवीजन ये मशीन खरीद रहे हैं। आठ लाख रुपये की कीमत वाली इस छोटी सी मशीन को कहीं भी आसानी से लाया ले जाया सकता है। इसको चलाने के लिए कर्मचारी के प्रशिक्षण पर डेढ़ से दो हजार रुपये का खर्च आता है।

पूरे विश्व के साथ देश के चुनिंदा शहरों में सड़कों की मजबूती जांचने के लिए इसी मशीन का इस्तेमाल हो रहा है लेकिन यूपी के साथ अलीगढ़ इसमें अब तक पिछड़ा है। इसका इस्तेमाल पहली बार अलीगढ़ मंडल में होगा।
विज्ञापन


पीडब्ल्यूडी के एक्सईएन अल हसन मंसूर सिद्दीकी ने बताया कि वर्तमान में अलीगढ़-पलवल फोरलेन का 500 करोड़ रुपये प्रोजेक्ट चल रहा है। वहीं, तकरीबन 400 दूसरी सड़कों को बनाने का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है।

बड़े प्रोजेक्ट को छोड़ दें तो औसतन एक साल में जिले में 125 करोड़ रुपये की सड़कों का निर्माण होता है। अब ठेकेदारों की मनमानी को ये मशीन बेनकाब करेगी। विभागीय अधिकारियों को जांच में सुविधा मिलेगी। बड़े अधिकारियों की मानें तो अगर मशीन का सही इस्तेमाल हुआ तो भ्रष्टाचार को रोकने में ये तकनीकी खासी मदद करेगी।

जांच प्रक्रिया लंबी 
अभी सड़क की मजबूती जांचने का तरीका बहुत लंबा है। लोक निर्माण विभाग प्रांतीय खंड एक के अधिशासी अभियंता प्रताप सिंह कहते हैं कि एक तय प्रक्रिया के तहत सड़क को अलग-अलग स्थानों पर खोद कर औसत निर्माण ऊंचाई, लंबाई, चौड़ाई और लगाया गया मैटीरियल जांचा जाता है।

मैटीरियल को प्रयोगशाला से भी चेक कराया जाता है। बड़ी जांच होने पर रूड़की, कानपुर और एएमयू के सिविल इंजीनियरों की टीम जांच करती है। यह काफी लंबी प्रक्रिया हो जाती है। 
ऐसे काम करती है मशीन 
इस मशीन को सड़क पर रखकर उसका निर्माण धनत्व तुरंत जांच लिया जाता है। मशीन से निकलने वाली रेडियम किरणों से निर्माण में प्रयुक्तपत्थर, गिट्टी, सीमेंट, बालू और बालू बदरपुर के मसाले का परिणाम फौरन सामने आ जाता है। मसलन अगर इस मसाले का ग्रेड टेंडर की शर्त के अनुसार 90 बताया गया हो तो मशीन की जांच में 88 फीसदी का रिजल्ट आना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर निर्माण रोका जा सकता है। चूंकि मशीन रेडियम किरणों के जरिए जांच करती है, इसलिए उसे प्रयोग करने वाले को दिल्ली स्थित टाटा सेंटर से दो दिन का प्रशिक्षण दिलवाया जाता है।

मैंने मेरठ में न्यूक्लियर गेज मशीन का डेमो देखा था। अब अलीगढ़ में इस मशीन का इस्तेमाल होगा। ये बेहद आधुनिक और विश्वसनीय तरीका है। -प्रताप सिंह, अधिशासी अभियंता पीडब्ल्यूडी प्रांतीय खंड एक
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें