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रेमडेसिविर लेना आसान नहीं, दो दिन में भी मिल जाए तो गनीमत

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रेमडेसिविर इंजेक्शन लेना कितना मुश्किल है। ये वही बयां कर सकता है, जिसने इसको प्राप्त किया हो। जिले में बीते दो दिन में इसकी जबरदस्त कालाबाजारी के बाद से स्थिति और खराब हो गई है। किसी भी सामान्य व्यक्ति को ये इंजेक्शन लेने में लगभग दो दिन का समय लग रहा है। इस पर भी इंजेक्शन मिल जाए तो गनीमत समझिए, क्योंकि कुछ लोग ने इसका स्टाक दबा लिया है। इन्हीं लोगों की मिलीभगत से कुछ निजी नर्सिंग होम तकरीबन सभी मरीजों के लिए इसको दवा के रूप में लिख रहे हैं, जिससे इसकी मांग बढ़ रही है।
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खैर के नई बस्ती निवासी 67 वर्षीय देवेंद्र रावत के बेटे राजीव रावत एक सप्ताह से इस इंजेक्शन के लिए परेशान रहे। उनके पिता जी को इसकी चार डोज लगनी है। दो लग चुकी थी, दो लगनी बाकी है। जिसके लिए वह सोमवार से परेशान थे। मंगलवार को पूरा दिन इसके लिए सिस्टम के चक्कर काटते रहे। सुबह 12 बजे से शाम साढ़े आठ बजे के बीच उन्होंने कई दफ्तरों के चक्कर लगाए। इसके बाद उनको गांधी आई हास्पिटल में संचालित मेडिकल स्टोर में ये इंजेक्शन ड्रग इंस्पेक्टर हेमेंद्र चौधरी की मौजूदगी में मिला। यहां दूसरे कई तीमारदार इसके लिए घंटों से इंतजार कर रहे थे। कुछ सोमवार से चक्कर लगा रहे थे।
अब जानिए कि इसको लेने की प्रक्रिया
जिस कोविड हास्पिटल में मरीज भर्ती है, वहां के डॉक्टर का लिखित पर्चा, जिसमें डाक्टर ने रेमडेसिविर इंजेक्शन लिखा हो। मरीज का मोबाइल नंबर, वाइटल्स का विवरण, पिछले 4 दिन की बुखार की स्थिति, ऑक्सीजन लेवल, गंभीर बीमारी का विवरण दर्ज हो। इसके साथ कोविड-19 की रिपोर्ट और मरीज का आधार कार्ड लेकर सीएमओ कार्यालय पहुंचना होता है। वहां पर ये सभी कागज जांचने के बाद सीएमओ से इसकी सहमति ली जाती है। इसके बाद जिले के नोडल अधिकारी एडीएम फाइनेंस से इसकी अनुमति होती है। काम यहीं नहीं खत्म होता है। इसके बाद ड्रग इंस्पेक्टर किसी अधिकृत मेडिकल स्टोर से इसको दिलवाते हैं। इस इंजेक्शन की कालाबाजारी रोकने के लिए इसको देने की प्रक्रिया खासी जटिल कर दी गई है, लेकिन स्टाक चेक नहीं हुए कि आखिर इंजेक्शन दो दिन में गायब कैसे हो गए..?
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