अध्ययन के मुताबिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रुकावटें अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। ग्रामीण इलाकों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में संसाधनों की कमी, विवाह और आर्थिक निर्भरता अब भी बेटियों की शिक्षा के रास्ते में रुकावट डालती है। बाधाओं को दूर करने की दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इससे मुस्लिम महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन संभव है।
शोध के दौरान कुल 150 प्रश्न पूछे गए। कुछ प्रमुख सवाल
- आपके परिवार में कितनी महिलाएं हैं। वह क्या करती हैं।
- आपकी मां और आपकी दादी ने जैसा जीवन जिया क्या आप अपनी बेटियों के लिए वैसा ही जीवन चाहते हैं
- आप अपनी बेटियों की शादी कितनी उम्र में करेंगे।
- आप अपनी बेटियों की शिक्षा के लिए अपनी आमदनी का कितना खर्च कर रहे हैं।
- बेटियों को शिक्षा दिलाने का मकसद सिर्फ शिक्षित करना है या उन्हें आर्थिक रूप से निर्भर बनाना है।
- बेटियां को उनके मनपसंद क्षेत्र में करियर बनाने देंगे या आपने खुद से कोई क्षेत्र चुन रखा है।
- आप बेटियों को शहर से बाहर या देश से बाहर नौकरी करने की इजाजत देंगे।
शिक्षा ही असली बदलाव की कुंजी
अध्ययन टीम के मार्गदर्शक रहे प्रो. नसीम अहमद खान ने बताया कि शिक्षा ही मुस्लिम समाज में सकारात्मक सामाजिक बदलाव का सबसे मजबूत माध्यम बन सकती है। जैसे-जैसे बेटियों की शिक्षा और रोजगार के प्रति अभिभावकों का दृष्टिकोण बदल रहा है, वैसे-वैसे आने वाले वर्षों में मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी हर क्षेत्र में बढ़ने की संभावना है। प्रो. नसीम अहमद खान के अनुसार, यह परिवर्तन न केवल मुस्लिम समाज के लिए, बल्कि पूरे भारतीय समाज के विकास और लैंगिक समानता के लिए एक प्रेरक संकेत है।