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सत्तर साल बाद रावण को नसीब हुआ ‘कब्रिस्तान’

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रावण का पुतला। - फोटो : CITY OFFICE
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अभिषेक शर्मा
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अपने सांप्रदायिक सौहार्द को लेकर महान अरबी लेखक और यात्री इब्नेबतूता के यात्रा वृतांत में स्थान पाने वाले कस्बा जलाली ने एक बार फिर सौहार्द की मिसाल पेश की है। यहां पिछले करीब सात दशक से रावण दहन स्थल को लेकर चल रहे विवाद का स्थायी हल दो दिन पहले दोनों पक्षों की सहमति और पुलिस-प्रशासनिक दखल से हो गया। इसी का परिणाम है कि मंगलवार को यहां पहली बार बिना किसी विवाद के रावण दहन होगा। इसके लिए कब्रिस्तान पक्ष के मुतवल्लियों ने जमीन से एक बीघा हिस्सा रावण दहन के लिए दे दिया है। जिस पर रावण दहन से पहले मंगलवार दोपहर को हवन यज्ञ का आयोजन भी प्रस्तावित है।
वैसे तो ये विवाद लगभग 70 वर्ष पुराना हो चुका है, लेकिन वर्ष 2014 में सरकार के निर्देश पर यहां कब्रिस्तान की जमीन की बाउंड्री कराने के बाद विवाद ने तूल पकड़ लिया था। हर साल दशहरा के मौके पर विवाद होता था और खुद पुलिस प्रशासनिक टीम व कड़े पहरे में रावण दहन ऐसी जमीन पर कराया जाता, जिसे कब्रिस्तान का हिस्सा बताया जाता।
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रावण के पुतला दहन स्थल को लेकर दोनों पक्षों में विवाद था। इस सांप्रदायिक विवाद को जड़ से समाप्त कराने के लिए एसडीएम कोल रंजीत सिंह व सीओ अतरौली पंकज श्रीवास्तव ने दोनों पक्षों से सहमति बनाने का प्रयास किया। बीते शनिवार को जलाली चौकी में हुई बैठक में कब्रिस्तान पक्ष के मुतवल्लियों ने विवादित जमीन का एक बीघे का हिस्सा रावण के पुतला दहन स्थल के लिए दान देने का प्रस्ताव रखकर विवाद को हमेशा के लिए शांत करा दिया। एसडीएम कोल व सीओ अतरौली ने समझौता पत्र तैयार कराया।
राजस्व टीम ने तत्काल जगह चिह्नित की। उस जगह बाउंड्रीवाल बनाने का काम भी शुरू हो गया। यह जमीन हमेशा के लिए लिखा पढ़ी में रावण दहन स्थल के रूप में दर्ज करा दी गई है। सीओ अतरौली पंकज श्रीवास्तव के अनुसार दोनों पक्षों को समझाने के बाद उनकी सहमति पर ही यह संभव हुआ है। अब एक बीघा जमीन की कब्रिस्तान से अलग बाउंड्री करा दी गई है।
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ऐसे निपटा विवाद
इस कब्रिस्तान की जमीन श्रेणी 15 में दर्ज है, जो मरघट व कब्रिस्तान के लिए होती है। नियमानुसार इस तरह की जमीन को निजी हितों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। ऐसे में इस जमीन के लगभग सात बीघे पर बतौर मुतवल्ली काबिज दोनों भाइयों आबिद हुसैन और वाहिद हुसैन ने समझौता करना ही बेहतर समझा। जमीन का श्रेणी का खुलासा तब हुआ जब इसके कागज खंगाले गए। पता चला कि 29 वर्ष पहले 1990 में नाहिद और वाहिद के पूर्वजों ने इस जमीन को अपने नाम दर्ज करा लिया था। उस पर पॉपूलर के पेड़ लगा दिए गए थे। हालांकि जमीन कब्रिस्तान बाउंड्री के अंदर थी, मगर इस पर दोनों भाई मालिकाना हक जताते थे। जब 1990 से पहले के कागज चेक हुए तो अधिकारियों को पुराने कागजों में ये जमीन श्रेणी-15 के खाते में मिली। ये देख अधिकारियों का माथा ठनका। उसके बाद आबिद और वाहिद को बुला कर इस हेर फेर के बारे में पूछताछ हुई। ऐसे में दोनों भाइयों ने एक बीघा जमीन रावण दहन स्थल के लिए देकर बाकी की छह बीघा जमीन को बचाना ही ठीक समझा।
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इब्ने बतूता ने किया था जलाली के सौहार्द का जिक्र
इतिहासकार बताते हैं कि भारत भ्रमण पर आए अरबी लेखक ने अपने यात्रा वृतांत में इब्ने बतूता ने जलाली कस्बे के हिंदू मुस्लिम के बीच सांप्रदायिक सौहार्द को अंकित किया है। उन्होंने कहा कि वह भारत के तमाम शहरों में घूमने गए लेकिन जलाली जैसा सौहार्द कहीं भी देखने को नहीं मिला। उनकी इस मिसाल के बाद दशकों तक यहां सौहार्द कायम रहा।
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