करबला में सत्य के लिए शहीद होने वाले हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में 10 मोहर्रम पर रंज और गम के माहौल में ताजियों का जुलूस निकाला गया। हजरत हुसैन की शहादत को याद करते हुए मातम करते हुए जिस्म को लहू लुहान किया गया।
अपने कदीमी रास्तों और पारंपरिक मार्गों से होकर जुलूस देहली गेट होता हुआ करबला पहुंचा। यहां पर गम के माहौल में ताजियों को सुपुर्द ए खाक किया गया। मोहर्रम को राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी दिवस के रूप में मनाया गया।
जुलूस में तिरंगे लहराए गए और आतंकवाद के खात्मे को कोई भी शहादत देने की बात कही गई। इस दौरान पुलिस और प्रशासन ने व्यवस्था बनाए रखने के व्यापक इंतजाम किए। जहां जरूरत हुई वहां पर ट्रैफिक को डायवर्ट भी किया गया। नगर निगम ने भी जुलूस के मार्गों पर व्यवस्था के लिए अतिरिक्त इंतजाम किए थे।
बुधवार एएमयू स्थित बैतुल सलात से सुबह 9.15 मजलिस शुरू हुई। इसके बाद जुलूस निकाला गया। जुलूस शमशाद मार्केट, एसएसपी आवास, पोस्टमार्टम हाउस, लोको कॉलोनी, जेल रोड, नुमाइश मैदान, जीटी रोड, गूलर रोड, देहली गेट, चरखवालान, शाहजमाल होकर शाम को करबला पहुंचा। इस बार जेल रोड पर चल रहे फ्लाई ओवर निर्माण कार्य के चलते जुलूस के रास्ते में थोड़ी सी तब्दीली की गई थी। पहले जुलूस तस्वीर महल से होकर जेल रोड क्रासिंग पर पहुंचता था।
इस बार जुलूस शमशाद मार्केट से एसएसपी आवास की ओर चला और यहां से पोस्टमार्टम हाउस होता हुआ जेल रोड क्रासिंग पहुंचा। यहां से जुलूस के पटरियां पार कराई गईं। यहां से जुलूस नुमाइश मैदान, फायर ब्रिगेड कॉलोनी, गूलर रोड, शक्ति नगर, देहली गेट, चरखवालान, शाहजमाल होता हुआ करबला पहुंचा।
करबला में रंज और गम के माहौल में ताजियों को सुपुर्द ए खाक किया गया। अंजुमन ए यादगार ए हुसैनी, अंजुमन ए सोगवार ए हसीना ने जुलूस में मातम किया। जुलूस में अंजुमन तंजीमुल अजा के मुख्तार जैदी, नादिर अब्बास नकवी, मुस्तफा जैदी, मौलाना मो. तकी, अहमर जैदी, मो. जाहिद हुसैन, मोहसिन रिजवी आदि मौजूद थे।
इससे पहले एएमयू स्थित बैतुल सलात में मौलाना मिर्जा इमरान अली दिल्ली वालों ने मोहर्रम की तारीख पर रोशनी डालते हुए बताया कि मोहर्रम की दसवीं तारीख दरअसल वो तारीख है जो हजरत इमाम हुसैन की शहादत की पाकीजा रोशनी से मामूर है।
उन्होंने जुल्म के आगे सिर नहीं झुकाया बल्कि जालिमों का मुकाबला किया और शहीद हुए।
उन्होंने कहा कि हक और इंसानियत पर कायम शख्स की तरह उन्होंने ईमान और इंसानियत की आवाज को बुलंद किया और आने वाली पीढ़ियों को सिखाया कि अन्याय के आगे सिर झुकाकर सुविधाओं की जिंदगी गुजारने की बजाय न्याय के लिए लड़ते हुए मर जाना बेहतर है।