गोंडा के गांव छोटी बल्लम निवासी नरेश सिंह सिनसिनवार (सिनसिनवार जाटों का एक गोत्र है) की गाथा जोश भर देती है। कारगिल युद्ध में नरेश ने महज 27 वर्ष की उम्र में दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए थे। वह कैप्टन सौरभ कालिया के नेतृत्व वाली टुकड़ी में थे, जो युद्ध के दौरान पाकिस्तान में घुस गई थी। उनके पिता राजेंद्र सिंह बताते हैं कि शत्रु सेना ने उनके नाखून तक नाेच लिए थे। इसके बाद भी उन्होंने सेना की गोपनीयता बनाए रखी।
दुश्मन की कैद में अमानवीय यातना झेलते हुए 6 जून 1999 को उन्होंने अपने प्राण बलिदान कर दिए। 12 जून को उनका शव गांव पहुंचा तो तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह भी उनको नमन करने गांव आए। सरकार ने वादे के अनुसार बलिदानी की बहन गुड़िया की शादी के लिए तीन लाख रुपये दिए थे। पिता ने बताया कि अप्रैल 1996 में नरेश सिंह का विवाह महका अतरौली निवासी कल्पना के साथ हुआ था। पत्नी को पेट्रोल पंप और 20 लाख रुपये मिले। अब उनकी पत्नी अपने मायके में ही रहती हैं। गांव में शहीद मार्ग बना।
माता पिता रह गए अकेले
माता रूपवती देवी व पिता राजेंद्र सिंह को बेटे का जाने का बहुत गम है, लेकिन गर्व है कि वह बलिदानी के पिता हैं। राजेंद्र सिंह को करीब 16 माह पूर्व लकवा व माता का दो माह पूर्व पित्त की थैली का ऑपरेशन हुआ है। दोनों गांव में अकेले रहते हैं, उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। कल्पना स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और नरेश की पुण्यतिथि पर प्रतिमा स्थल तक आती है, लेकिन वह सास ससुर से कोई संबंध नहीं रखती है। गांव प्रधान क्षेत्रपाल सिंह ने बताया कि विभिन्न मौकों पर बलिदानी की प्रतिमा पर श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाते हैं। शुक्रवार को उनकी प्रतिमा के समक्ष कैंडल मार्च कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाएगी। हफ्ते में एक बार सफाई कर्मी प्रतिमा परिसर की सफाई करता है।