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साहित्यकारों का पुरस्कार लौटाना तमाशा है: नीरज

Thu, 22 Oct 2015 01:59 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/अलीगढ़
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देश में सांप्रदायिक असहिष्णुता के चलते साहित्यकारों द्वारा लौटाए जा रहे पुरस्कारों पर पद्मभूषण गोपाल दास ‘नीरज’ ने कहा कि यह सिर्फ एक तमाशा है। ऐसे लेखकों को अपनी लेखनी से विरोध करना चाहिए। मौजूदा समय में सिर्फ चर्चाओं में रहने के लिए यह पुरस्कार वापसी का उपक्रम किया जा रहा है। जहां तक देश में होने वाली घटनाओं का प्रश्न है वह पहले भी होती रहीं और अब भी हो रही हैं, लेकिन पुरस्कार वापसी का यह दृश्य खड़ा करके लेखक स्वयं के पुरस्कार स्वीकार करने के फैसले पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं।
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नीरज ने यह बयान ग्वालियर में एक कार्यक्रम के दौरान दिया है। प्रसिद्ध गीतकार यश भारती पुरस्कार से सम्मानित नीरज ने यह बयान उस समय दिया है जब प्रदेश सरकार ने यश भारती पुरस्कार से सम्मानित जनों को 50 हजार रुपये की पेंशन देने की घोषणा की है। नीरज ने कहा कि लेखक की रचना विरोध का सशक्त माध्यम होती है। उसे समय मिटा नहीं सकता। सत्ताएं दबा नहीं सकती हैं। इसलिए क्या ही अच्छा हो कि तमाशा खड़ा करने की बजाय रचनाकर्म के माध्यम से माहौैल से टकराने की कोशिश करें।


मैंने एक बार कहा था ‘वो जिनको न पीने का है सलीका न पिलाने का है शऊर, ऐसे ही लोग चले आए हैं मय खाने में’। (इसका अर्थ यह था कि वह जिनको देश के हितों से कोई सरोकार नहीं है वही लोग सत्ता या संसद में चले आए हैं)। यह बात लोगों तक भी पहुंची। संदेश भी पहुंचा। 
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