16 सितंबर 2007 को एएमयू के ऑफताब हॉल के पास कैफेडिक्स कैंटिन के सहारे एक छात्र बेहोश पड़ा है। ऑफताब हॉल निवासी बीएससी ऑनर्स छात्र मजहर नईम को मेडिकल कॉलेज पहुंचाया गया। जहां उसकी मौत हो गई।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के बागपत निवासी बीएससी छात्र मजहर नईम की 15 वर्ष पूर्व हुई हत्या के मामले में दोषी करार एक आरोपी को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। यह फैसला एडीजे-17 मनोज कुमार सिद्धू की अदालत से सुनाया गया है। बता दें कि यह हत्या लूट के इरादे से हुई थी और हत्याकांड के बाद एएमयू में जमकर उपद्रव व साइनडाई (अनिश्चितकाल के लिए बंदी) तक घोषित हुआ था।
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अभियोजन अधिवक्ता एडीजीसी सुधांशु अग्रवाल ने बताया कि यह घटना 16 सितंबर 2007 की है। मुकदमा एएमयू प्रॉक्टर कार्यालय के कर्मचारी अनवार खां की ओर से दर्ज कराया गया। जिसमें आरोप था कि देर रात करीब साढ़े दस बजे प्रॉक्टर कार्यालय को सूचना मिली कि ऑफताब हॉल के पास कैफेडिक्स कैंटिन के सहारे एक छात्र बेहोश पड़ा है। ऑफताब हॉल निवासी बीएससी ऑनर्स छात्र मजहर नईम को मेडिकल कॉलेज पहुंचाया गया। जहां उसकी मौत हो गई।
पुलिस विवेचना में उजागर हुआ कि मजहर नईम तीसरे रोजे के दिन तराबी पढ़कर अपने हॉल लौट रहा था। तभी रात करीब सवा दस बजे उसे पीछे से आए बाइक सवार तीन अज्ञात हमलावरों ने लूट के इरादे से रोका और तमंचे की बट सिर में मारी। जिससे वह बेहोश होकर वहीं गिर गया। बाद में बदमाश उसका मोबाइल आदि लूट ले गए।
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दौरान-ए-विवेचना पुलिस ने फ्रेंडस कॉलोनी क्वार्सी के मो.असरफ जमाल, जीवनगढ़ के तारिक और सादिक अली के नाम उजागर किए। उन्हें गिरफ्तार कर लूट में प्रयुक्त तमंचा व छात्र से लूटे गए मोबाइल को बरामद किया गया। मामले में चार्जशीट दायर की गई। सत्र परीक्षण के दौरान साक्ष्यों व गवाही के आधार पर न्यायालय ने तारिक व सादिक को बरी किया है, जबकि मुख्य आरोपी मो.असरफ जमाल को तमंचा व मोबाइल बरामद होने के आधार पर दोषी करार दिया था। मंगलवार को उसे उम्रकैद व 17 हजार रुपये जुर्माने से दंडित किया है। बता दें कि इस मामले में पैरवी मजहर नईम के पिता नईम अली ने की, जो मेरठ के इंटर कॉलेज में प्रवक्ता थे।
एडीजीसी सुधांशु अग्रवाल बताते हैं कि छात्र मजहर नईम की हत्या में कोई चश्मदीद नहीं था। मगर पुलिस विवेचना और न्यायालय में सत्र परीक्षण के दौरान परिस्थितिजन्य साक्ष्यों ने ऐसी गवाही दी कि एक आरोपी को सजा तक पहुंचाया है। वे बताते हैं कि इस घटना का मुकदमा अज्ञात में दर्ज कराया गया था। मुकदमे में लूट का उल्लेख नहीं था। मगर जब उसके पिता अगले दिन आए और उन्हें शव सौंपा गया तो उन्होंने बताया कि बेटे का मोबाइल गायब है।
साथ में मजहर नईम के रूममेट छात्र ने भी बताया कि हम दोनों के बीच एक ही मोबाइल था। उसी मोबाइल से दोनों अपने परिवारों से बातें करते थे। पिता ने भी इसकी तस्दीक की। इस पर मोबाइल की खोज आईएमईआई नंबर के आधार पर शुरू हुई तो पुलिस को पता चला कि उसमें किसी ने सिम डाल रखी है। जब सिम आईडी के आधार पर पुलिस उस व्यक्ति तक पहुंची तो बताया कि उसकी आईडी चोरी की गई है। बाद में मोबाइल लोकेशन व सीडीआर के आधार पर आरोपियों तक पहुंची। तीनों की गिरफ्तारी के साथ मोबाइल भी बरामद किया गया। इस तरह इस मुकदमे में सिर्फ मोबाइल असरफ को सजा करा सका। इतना ही नहीं कुल 14 गवाह हुए, जिनमें वादी मुकदमा, पिता, रूममेट छात्र, आईडी स्वामी व्यक्ति सहित पुलिसकर्मी व डॉक्टर आदि शामिल रहे। इनमें सबसे आखिरी गवाह एडीजीसी ने मोबाइल बरामद करने वाले तत्कालीन दरोगा को कराया। जिसके सामने मोबाइल की शिनाख्त कराई गई। दरोगा ने मोबाइल रंग व आईएमईआई नंबर के आधार पर पहचाना और वही सजा का आधार बना।
सीबीआई थी शहर में और एएमयू में हुआ बवाल
इस घटना का जिक्र करते हुए उस समय की एएमयू छात्र यूनियन के उपाध्यक्ष माजिन हुसैन बताते हैं कि यह एक वर्ष में तीसरे एएमयू छात्र की हत्या थी। इससे पहले फरवरी में पूर्वी यूपी के साबित अली नाम के छात्र की हत्या हुई थी। इसके बाद मार्च में इंजीनियरिंग के कौशर अली नाम के छात्र की हत्या हुई थी। साबित अली की हत्या में कुछ आरोपी नामजद किए गए थे। वहीं कौशर अली की हत्या में अज्ञात आरोपी थे। लगातार दो हत्याओं से छात्र आंदोलित थे।
हमारी यूनियन ने उस समय के गृह मंत्री शिवराज पाटिल से मुलाकात कर कौशर की हत्या की जांच सीबीआई से कराने की मांग की। उनके आदेश पर कौशर अली की हत्या की जांच सीबीआई द्वारा की गई। बाद में वह हत्या भी लूट के इरादे से होना उजागर हुआ था। जब मजहर नईम की हत्या हुई, तब सीबीआई शहर में कौशर अली की हत्या की जांच के लिए रुकी हुई थी। लगातार तीसरी हत्या को लेकर सीबीआई ने भी इस घटना में जांच को केंद्रित किया था। संकेत थे कि कहीं लगातार दोनों हत्याएं एक ही ग्रुप ने तो नहीं कीं। बाद में सीबीआई कौशर की हत्या की जांच पर केंद्रित होकर जांच पूरी कर चली गई थी। इस हत्या के बाद छात्र भड़क गए थे।
कैंपस में जमकर उपद्रव हुआ और एएमयू के तत्कालीन कुलपति पीके अब्दुल अजीज का लॉज, प्रॉक्टर कार्यालय, एएमयू स्टाफ क्लब में जमकर तोड़फोड़ व आगजनी की गई थी। फायरिंग तक हुई थी। उस घटना के बाद वीसी द्वारा एएमयू में साइनडाई घोषित की गई थी और पूरा कैंपस खाली कराया गया था। इसके बाद हॉस्टल व हॉलों को खाली कराकर उनकी तलाशी कराई गई थी और ढाई माह तक एएमयू पूरी तरह बंद रहा। दिसंबर में नए सिरे से एएमयू खुला और पहली बार वहां हॉल व हॉस्टल छात्रों को नए सिरे से आवंटित किए गए थे। कुल मिलाकर इस घटना के बाद काफी उपद्रव हुआ था।
माजिन जैदी बताते हैं कि एएमयू के इतिहास में वीसी लॉज में ऐसी तोड़फोड़ कभी नहीं हुई। घटना के बाद पूरा वीसी लॉज नया बनाना पड़ा था। एएमयू में साइनडाई के चलते वह सबसे लंबी ढाई माह की बंदी रही थी। उस घटना को याद कर लोग अभी भी सिहर उठते हैं।
सजा सुन फूट-फूटकर रोया दोषी
जब छात्र की हत्या में मो. अशरफ को सजा सुनाई गई तो वह कटघरे में फूट-फूटकर रोने लगा। परिवार के सदस्य भी वहां मौजूद थे। सजा सुन वे भी हैरान रह गए।