श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के लिए अपने शहर का हैंडीक्राफ्ट-आर्टवेयर कारोबार भी तैयारी कर रहा है। इन दिनों दिन रात इस कारोबार से जुड़े लोग लड्डू - गोपाल बनाकर सप्लाई देने में जुटे हैं। यहां बनकर तैयार होने वाले लड्डू गोपाल देश के साथ - साथ दूसरे मुल्कों में भी जन्माष्टमी के लिए जन्म लेंगे। दो वर्ष के कोरोना काल के बाद इस बार बाजार में कुछ रौनक है और प्रति दिन डेढ़ से दो टन माल की सप्लाई का अनुमान इस सीजन में है।
ब्रास (कापर, पीतल व जस्ता मिक्स) निर्मित यह मूर्ति देश में कहीं और नहीं बनती। यहां की मूर्ति की अपनी एक पहचान है। ताला कारोबार के साथ ही आजादी के पहले से यहां ढलाई के जरिये पीतल की मूर्ति बनाने का काम चल रहा है। पहले मूर्तियां बनाकर छोटे-छोटे व्यापारी दिल्ली के बाजार में खुद ही बेचने जाया करते थे। मगर पिछले पांच दशक से यह कारोबार अपनी पहचान बना चुका है। यहां की मूर्ति की अपनी पहचान है। जोकि अंदर से खोखली मूर्ति बैल्डिंग के साथ बनाने की कला है। दक्षिण भारत में ठोस मूर्ति बनाई जाती हैं, जो वजनी और कीमती भी होती है। पीतल नगरी मुरादाबाद के कारोबारी भी यहां से ऑर्डर पर मूर्ति बनवाकर मंगाते हैं। आज अलीगढ़ शहर के सासनी गेट, जयगंज, सराय भूखी, भुजपुरा, पला रोड, बिहारी नगर व उनसे सटे आसपास के इलाकों में यह कुटीर उद्योग के रूप में हो रहा है। किसी घर में ढलाई, किसी में पॉलिस, किसी में चिताई, किसी में बैल्डिंग का काम मजदूरी पर होता है।
ऐसे बनती है मूर्ति
यहां पीतल की चादर या सिल्ली की दो तरह से मूर्ति बनती हैं। जिसकी पहले मिट्टी के सांचे में ढलाई होती है। फिर उसके टुकड़ों को बैल्डिंग के जरिये जोड़ा जाता है। इसके बाद सबसे महीन काम हाथ की दस्तकारी चिताई के जरिये डिजाइन बनाई जाती है। इसके बाद पॉलिस, प्रक्रिया से गुजारकर बाजार में बेचने योग्य बनाया जाता है। सामान्य दिनों में यहां विभिन्न प्रकार की मूर्तियां बनती हैं। इन दिनों लड्डू गोपाल की मांग के अनुसार उन्हें ज्यादा बनाया जा रहा है।
यहां तक सप्लाई
दिल्ली, मध्य प्रदेश, बिहार, महाराष्ट, कर्नाटक के अलावा यूपी के कई शहरों में मूर्ति की आपूर्ति होती है। इनकी मुरादाबाद, मथुरा, वृंदावन में सर्वाधिक आपूर्ति। ऑनलाइन प्लेटफार्म पर भी मूर्तियां बिक रही हैं। कनाडा, अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस में रहने वाले भारतीयों के बीच इनकी मंाग है।
इस्कान मंदिरों की स्टाल पर आपूर्ति
देश विदेश में स्कान मंदिरों के स्टालों पर भी इनकी आपूर्ति है। वहां इन्हें लार्ड कृष्णा के नाम से बेचा जाता है।
पोशाक के काम में रम गए इरफान
क्वार्सी निवासी इरफान अहमद लड्डू गोपाल व हिंदू देवी - देवताओं के पोशाक के काम में रम गए हैं। उन्हें इस काम में बहुत आनंद आता है। इसके साथ ही रोज 400-500 रुपये कमा लेते हैं। वह कहते हैं कि 30 वर्ष से पोशाक का काम कर रहे हैं। मूलरूप से मथुरा के रहने वाले हैं। यहां पांच साल से रह रहे हैं।
लड्डू गोपाल बनाने में जुटे हैं मैराज
अतरौली वैसपाड़ा के मैराज खां सासनीगेट सराय भूखी में कारखाना चलाते हैं। उन्हें उनके ससुर बुंदू खां वर्ष 1996 में अतरौली से मोटर मैकेनिक का काम छुड़वाकर यहां लाए थे। उनके कारखाने में ढलाई के बाद लड्डूगोपाल, राधा-कृष्ण और अन्य मूर्तियों की बैल्डिंग, रेताई, पॉलिश और चिताई (आकृतियों को उभारने का काम होता है। उनके साथ इसी कारोबार में बड़े बेटे जाविद खान और सुबोर खान भी हाथ बंटाते हैं।
कारोबार एक नजर में
500 करोड़ रुपये सालाना है पीतल मूर्ति का कारोबार
150 करोड़ रुपये सालाना का है निर्यात
35 निर्यातक विदेशी बाजार में बेचते हैं पीतल मूर्ति
50 बड़े पीतल मूर्ति के हैं निर्माता
50 हजार लोगों की जुड़ी है रोजी रोटी
500 ढलाई भट्ठी व मेन्युफैक्चरिंग यूनिट
10 करोड़ रुपये के मिले हैं बाजार से आर्डर
02 करोड़ रुपये का है निर्यात
मूर्तियों की कीमत
सुपरफाइन 800 रुपये किलो तक
अष्टधातु 1100 रुपये किलो तक
- जन्माष्टमी के समय लड्डू गोपाल की डिमांड बढ़ी है। इन दिनों में सुपरफाइन माल की अधिक डिमांड होती है, जो देश में कहीं नहीं बनता। हमारा माल देश विदेश तक जाता है।-अशोक यादव, निर्माता/निर्यातक
-अलीगढ़ में चादर, सिल्ली दोनों का माल बनता है। इनकी डिमांड देश विदेश में है। यह हल्के वजन का होता है। बाकी देश में यह माल कहीं नहीं बनता। त्योहार पर सामान्य से 20 फीसदी अधिक डिमांड है। - कोमल कटारा, निर्माता/निर्यातक
ये उत्पाद भी होते तैयार
कोलकाता एवं सूरत की फैंसी पोशाक, जड़ी वाली पोशाक, लड्डू गोपाल का ट्रेवलिंग बैग, स्कूल बैग, मच्छरदानी, मास्क, कूलर, पंखे, एसी, राखी, इत्र, स्प्रे, मंदिर के पर्दे, आसन, लड्डू गोपाल के इंडोर गेम, खिलौने, गुजराती मीने के फैंसी झूले, कोलकाता के मोती के झूले, फैंसी फूल बंगले, गाय-बछड़े के सेट, भोग की थाली, माखन-मटकी, बच्चों की श्रीकृष्ण-राधा के फैंसी ड्रेस आदि।