साहित्य, संस्कृति और पत्रकारिता में कमलेश्वर जी का योगदान उल्लेखनीय है। कमलेश्वर ने लघु के वैराट्य और विराट की लघुता के मर्म को पहचाना था और लघु के साथ खुद को जोड़ा था। 'समानांतर कहानी की गोष्ठियों के विषयों को इस संदर्भ में देखा जा सकता है। इसी क्रम में उन्होंने कथा-संस्कृति की परिकल्पना की थी। अलीगढ़ कमलेश्वर का दूसरा घर था। कई स्थानों पर उन्होंने अपने “अलीगढ़ कुनबे' का जिक्र किया है। इस कुनबे में कुंवरपाल सिंह, नमिता सिंह,, काजी अब्दुल सत्तार, शहरयार जैसे वरिष्ठ जन के साथ-साथ आशिक बालौत और अजय बिसारिया जैसे युवा भी शामिल थे। प्रो. कुंवरपाल सिंह उनके अभिन्न थे। वे जब याद करते कमलेश्वर अलीगढ़ आ जाते, साथ में उनकी पत्नी गायत्री जी भी होतीं। संस्कृति संगम, कथा-समारोह, सेमिनार और जनवादी लेखक संघ की छोटी-बड़ी गोष्ठियों में वे पूरे मन से शामिल होते। वे छोटे-बड़े-सभी उम्र के लोगों से दोस्ताना व्यवहार करते थे, उनकी रचनाओं को ध्यानपूर्वक पढ़ते और टिप्पणी करते थे। -अजय बिसारिया, प्राध्यापक, हिंदी विभाग एएमयू
कमलेश्वर की प्रेरणा से लोक साहित्य की तरफ बढ़ा रुझान
कमलेश्वर जी की यादें अलीगढ़ से बहुत जुड़ी हैं, जो आज भी मुझे सुखद अनुभूति देती है। अलीगढ़ क्लब में शहरयार के साथ कमलेश्वर जी ने साहित्य पर चर्चा की। मैं भी साथ में था। युवाओं को साहित्य की तरफ जोड़ा जाए, ताकि उनमें समझदारी पैदा हो सके। एक बार एएमयू के गेस्ट हाउस में कमलेश्वर जी, नमिता सिंह, शहरयार साहित्य पर चर्चा कर रहे थे, तभी मैंने कहा कि मेवात पर एक लेख लिखा है, तब कमलेश्वर जी ने कहा कि उस लेख को मुझे देना। कुछ दिनों बाद उन्होंने हिंदुस्तान अखबार के संपादकीय पेज पर मेवात के बारे में उन्होंने लंबा-चौड़ा लेख लिखा, जिसमें उन्होंने मेरे और लेख के बारे में जिक्र किया। यह मेरे लिए एक उपलब्धि है। -प्रो. आशिक अली, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, एएमयू