एएमयू की कुलपति प्रो. नईमा खातून ने कहा कि भूगोल विभाग से मौसम गुब्बारा छोड़ा जाना एक उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि विभाग के लिए यह दुर्लभ उपलब्धि है, क्योंकि यह एक नई पहल के रूप में अपना पहला मौसम गुब्बारा छोड़ कर शताब्दी वर्ष का जश्न मना रहा है। विज्ञान संकाय के डीन प्रो. कमरुल एच. अंसारी ने कहा कि यह जलवायु डेटा संग्रह और विश्लेषण में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। विभागाध्यक्ष प्रो. निजामुद्दीन खान ने स्वागत भाषण दिया। संचालन परियोजना समन्वयक प्रो. अतीक अहमद ने किया। प्रो. शहाब फजल ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
पांच साल के लिए प्रोजेक्ट को मिलेंगे 30 लाख रुपये
परियोजना समन्वयक प्रो. अतीक अहमद ने बताया कि एएमयू और इसरो के बीच करार हुआ है। यह पांच साल के लिए प्रोजेक्ट है। हर साल छह लाख रुपये यानी पांच साल में 30 लाख रुपये मिलेंगे। समय-समय पर मौसम गुब्बारा छोड़ा जाएगा।
इस तरह मिलेगा डेटा
परियोजना समन्वयक प्रो. अतीक अहमद ने बताया कि गुब्बारे में करीब छह मीटर की रस्सी बंधी होती है, जिसकी अंतिम छोर पर रोडियोसोंड लगा है, जिसकी दाहिनी ओर लगे जीपीएस से लोकेशन की जानकारी मिलेगी। बायीं ओर सेंसर लगा है, जो तापमान, आर्द्रता, दबाव, हवाओं की दिशा-गति की जानकारी एकत्र कर बीच में लगे ट्रांसमीटर को देगा। ट्रांसमीटर भूगोल विभाग की छत पर लगे रिसीवर को डेटा भेजेगा, जो स्क्रीन पर प्रदर्शित होगा।
यह होगा फायदा
भूगोल विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अहमद मुज्तबा सिद्दीकी ने बताया कि इस गुब्बारे से माैसम संबंधी जानकारी के साथ साथ जलवायु परिवर्तन का आंकड़ा भी जुटाया जा सकेगा। जैसे ही गुब्बारा हवा में गया, वैसे ही उसने डेटा भेजना शुरू कर दिया। मौसम पूर्वानुमान होने से प्राकृतिक आपदाओं को कम किया जा सकता है।