अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र रहे प्रसिद्ध शायर मौलाना हसरत मोहनी की शायरी का एक बड़ा हिस्सा कृष्ण प्रेम के लिए जाना जाता है। इसके साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में भी उन्होंने मुखर होकर भूमिका निभाई।
उन्होंने अलीगढ़ के अंदर पहला खादी आश्रम रसल गंज, जहां पर आज दानपुर कंपाउंड जाना जाता है, वहां पर शुरू किया और स्वदेशी को घर-घर तक पहुंचाने का कार्य किया। एएमयू के इतिहास के मामलों की जानकार और उर्दू एकेडमी के निदेशक डॉ राहत अबरार कहते हैं कि प्रत्येक जन्माष्टमी के अवसर पर मौलाना हसरत मोहनी मथुरा पहुंच जाया करते थे। इस बार यह एक सुखद संयोग है कि स्वतंत्रता दिवस और कृष्ण जन्माष्टमी करीब करीब एक साथ ही हैं। डॉ राहत अबरार कहते हैं कि कानपुर के मोहन नामक एक कस्बे में हसरत मोहनी का जन्म हुआ था। उन्होंने अपनी स्नातक की शिक्षा एएमयू से पूरी की। इंकलाब जिंदाबाद का नारा मौलाना हसरत मोहानी ने ही दिया था।
मौलाना हसरत मोहनी ने खुद लिखा है कि उनकी जिंदगी में तीन एम बहुत महत्वपूर्ण हैं। मक्का, मथुरा और मास्को। मक्का उनके धर्म का तीर्थ स्थान है। मथुरा से उन्हें बेहद अगाध प्रेम है और मास्को भारत के लिए राजनयिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। इस तरह कृष्ण के प्रति उनका अनुराग समझा जा सकता है। कृष्ण भक्ति के लिए समर्पित मौलाना हसरत मोहानी की कुछ पंक्तियां ' हसरत की भी कबूल हो मथुरा में हाजिरी, सुनते हैं आज कहां पर तुम्हारा करम है आज' 'पैगाम ए हयात ए जावेदां था, हर नगमा ए कृष्ण बांसुरी का'