कहते हैं कि दलों के बैनरतले होने वाले किसी भी चुनाव में निर्दल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसा ही विधानसभा चुनाव में अपने जिले की सियासत में देखने को मिलता है। यहां तीन चुनाव को छोड़ दें तो कभी निर्दल महत्वपूर्ण भूमिका में नहीं रहे, मगर काम बिगाड़ वाली स्थिति में जरूर रहे हैं। ज्यादा पुराने नहीं हाल के 2007 और 2002 के चुनाव में शहर व कोल सीट पर कुछ ऐसे ही हालात रहे। इसी तरह बरौली के 2007 के चुनाव में यह हालात देखने को मिले थे।
अपने जिले के सियासी इतिहास पर गौर करें तो आजादी के बाद लगातार तीन चुनाव ऐसे रहे, जब यहां अपने चेहरे के दम पर कुछ निर्दलों ने चुनाव जीता। इनमें इगलास से किशोरी रमण सिंह, फिर इसी सीट पर श्यौदान सिंह, टप्पल से महेंद्र सिंह और फिर बरौली से केशवदेव हरियाणा निर्दल विधायक बने। कहा जाता है कि उनका अपना रसूख था। उनका अपना सम्मान था और उनकी अपनी लोगों के बीच पैंठ थी। इसके बाद वह दौर कभी नहीं आया, जब जिले में किसी सीट पर निर्दल ने कोई क्रांतिकारी परिणाम लाकर दिखाया हो। मगर काम बिगाड़ वाली स्थिति में कई सीटों पर निर्दल रहे हैं। इनमें 2017 के चुनाव में कोल सीट पर, 2002, 2007 के चुनाव में भी यह परिणाम देखने को मिले। कुछ सीट तो ऐसी रहीं कि इन काम बिगाड़ा के फेर में बहुत कम वोटों से चुनाव हारे और लोग आज भी उस काम बिगाड़ा को याद करते हैं।
निर्दलों के परिणाम
-1957 के चुनाव में इगलास से किशोरी रमण सिंह निर्दल जीते।
-1962 के चुनाव में इगलास से श्यौदान सिंह व टप्पल से महेंद्र सिंह निर्दल जीते।
-1967 के चुनाव में बरौली चंडौस से केशवदेव निर्दल जीते।