परिवार नियोजन के लिए प्रचार-प्रसार में पैसा खर्च कर रही सरकार के मकसद को व्यवस्था की खामियां पूरा नहीं होने दे रही हैं। अलीगढ़ जिले की बात करें तो नसबंदी के लिए यहां 37 लाख की आबादी पर मात्र दो डॉक्टर ही हैं। इनमें एक डॉक्टर राम बिहारी ठा. मलखान सिंह जिला अस्पताल के हैं और दूसरी मोहन लाल गौतम राजकीय महिला चिकित्सालय की डॉ. नाहिद रिजवी हैं।
डॉ. रामबिहारी महिला और पुरुष दोनों की नसंबदी करते हैं, जबकि डॉ. नाहिद महिलाओं के ही केस डील करती हैं। इन दोनों को नसबंदी के अलावा अस्पतालों में अपनी नियमित सेवाएं भी देनी होती हैं। शासन की मंशा है कि सरकारी अस्पताल और सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर चार कैंप एक महीने में लगाए जाएं। इस तरह जिले के 12 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रति माह 48 नसबंदी शिविर लगने चाहिए, लेकिन हकीकत की तस्वीर इससे बेहद उलट है।
डॉ. प्रधान कहती हैं कि इन दिनों सबसे ज्यादा चलन में पीपीआईसीडीयू है, जिसे साधारण भाषा में कॉपर-टी कहते हैं। इसमें प्रसव के बाद ही महिला के शरीर में इंप्लांट कर दिया जाता है। इसकी सफलता दर अधिक है और यह लगाने में बेहद आसान है। 10 साल तक यह काम करता है। हमारे अस्पताल में ही प्रति माह 250 से 300 केस इसके होते हैं।
मोहन लाल गौतम महिला चिकित्सालय की सीएमएस डॉ. गीता प्रधान कहती हैं कि महिला नसबंदी के लिए सबसे अनुकूल समय नवंबर से मार्च के बीच का होता है। इसी समय नसबंदी के सबसे ज्यादा केस आते हैं। महिला अस्पताल में प्रति वर्ष 2500 नसबंदी तक हो जाती हैं।