भूगोल विभाग के शोधकर्ताओं का कहना है कि हर पांच में से एक बुजुर्ग किसी न किसी स्तर पर भोजन की असुरक्षा से जूझ रहा है। सरकारी योजनाएं जैसे वृद्धावस्था पेंशन और राशन कार्ड मौजूद हैं, लेकिन कई बुजुर्गों तक लाभ समय पर नहीं पहुंचता। इसमें पहचान और पंजीकरण की दिक्कत के अलावा पोषण पर खास फोकस की कमी देखी जा रही है। अगर समय रहते स्थानीय स्तर पर पहचान और मदद की व्यवस्था मजबूत नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गहरी हो सकती है।
बीमारी के साथ भूख की दोहरी मार
एक तरफ गांवों में बुजुर्ग खेती से अलग हो रहे हैं और दूसरी ओर शहरों में अकेले रहने वाले बुजुर्गों के सामने भोजन की समस्या पैदा हो रही है। इनमें से अगर बीमार बुजुर्गों की बात करें तो बीमार और चलने-फिरने में असमर्थ लोगों की स्थिति सबसे खराब है। शोधकर्ता सैयद नौशाद अहमद और मो मोहसिन ने अध्ययन में बताया कि कई बुजुर्ग दवाइयों और इलाज पर खर्च के कारण भोजन पर कटौती कर देते हैं। इसका नतीजा है कि बुजुर्गों में कमजोरी बढ़ रही है। बीमारियां और गंभीर होती जा रही हैं और काम करने की क्षमता खत्म हो रही है।
सिर्फ गरीबी नहीं, कई कारण जिम्मेदार
शोध में सामने आया है कि बुजुर्गों में भूख का संबंध केवल आय से नहीं है। खराब स्वास्थ्य और चलने-फिरने में दिक्कत, मानसिक अवसाद और अकेलापन, परिवार से दूरी या सहारा न होना, सामाजिक और आर्थिक असमानता जैसे कारक मिलकर बुजुर्गों को भोजन से वंचित कर रहे हैं।