सारसौल स्थित सिद्धपीठ साई मंदिर में गुरू पूर्णिमा हवन करते लोग।
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गुरुओं को नमन कर शनिवार को गुरू पूर्णिमा की शुरुआत हुई। दिनभर हवन यज्ञ, प्रवचन, भंडारे और धार्मिक आयोजन हुए। दोपहर में भोग व प्रसाद बंटा और शाम को भी कीर्तन हुआ। इसके अलावा विभिन्न शिक्षण संस्थानों में आयोजन कर बच्चों में गुरु-शिष्य की परंपरा के संस्कार बताए गए। वहीं श्रद्धालु अन्य जिलों में अपने गुरू के यहां पूजा अर्चना के लिए पहुंचे। इस दौरान सामूहिक रूप से जिले में यही संदेश दिया गया कि गुरू के बिना ज्ञान संभव नहीं है।
शहर से लेकर देहात तक मंदिरों, धर्मशालाओं, सार्वजनिक स्थानों पर सुबह से ही आयोजन शुरू हो गए। सुबह-सुबह कई श्रद्धालु अन्य जिलों में रहने वाले गुरुओं के यहां रवाना हुए। फूलमाला, मिठाई, फल, मेवा की दिनभर खरीदारी चलती रही। लोग अपने गुरुजनों के यहां पहुंचे। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच गुरु का तिलक कर उनके पैर धोए। शॉल से लेकर अन्य वस्त्र भेंट किए। सार्वजनिक पूजन के बाद भंडारे का आयोजन हुआ। श्रद्धालुओं ने जगह-जगह प्रसादी का भी वितरण किया। मंदिरों में गुरू पूर्णिमा पर विशेष आयोजन हुए। इस दौरान आयोजित प्रवचनों में शिष्यों को गुरु-शिष्यों की अनूठी परंपरा के महत्व के बारे में बताया गया। बताया गया कि अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला ही गुरू होता है। जबकि इसके अलावा जब भगवान विष्णु चार महीने के लिए शयन अवस्था में चले जाते हैं तो गुरू का महत्व और बढ़ जाता है।