अलीगढ़ में छिपा है ऊर्जा का बड़ा खजाना
यह शोध अलीगढ़ के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि जिला देश के प्रमुख मीट निर्यात केंद्रों में शामिल है। जिले में सात लाइसेंसी मीट एक्सपोर्ट यूनिट संचालित हैं, जबकि आसपास के जनपदों में रोजाना करीब आठ हजार भैंसों का कटान होता है। विशेषज्ञों के अनुसार एक बड़े पशु के वजन का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा गोबर, रक्त, आंतों के अवशेष और अन्य जैविक अपशिष्ट के रूप में निकलता है। वर्तमान में रक्त और गोबर जैसे अपशिष्ट का बड़ा हिस्सा फेंक दिया जाता है, जबकि आंतों और हड्डियों से विभिन्न उत्पाद तैयार किए जाते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तकनीक को औद्योगिक स्तर पर अपनाने पर ऐसे जैविक कचरे के 70 से 80 प्रतिशत हिस्से को ऊर्जा उत्पादन में बदला जा सकता है। इससे कचरा निस्तारण की समस्या कम होने के साथ उद्योगों को ऊर्जा का वैकल्पिक स्रोत भी मिल सकता है।
नगर निगम और डेयरियों को भी मिलेगा लाभ
शोधकर्ताओं के अनुसार अल्ट्रासोनिक प्री-ट्रीटमेंट तकनीक का उपयोग केवल बूचड़खानों के कचरे तक सीमित नहीं है। इसे नगर निगम के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी), डेयरियों से निकलने वाले गोबर और अन्य जैविक कचरे के प्रबंधन में भी लागू किया जा सकता है। यदि इस तकनीक का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाए तो शहरों में अपशिष्ट निस्तारण की लागत कम होगी और बायोगैस उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी।
अलीगढ़ के बूचड़खानों में छिपा है ग्रीन गोल्ड
- जिले में सात लाइसेंसी मीट एक्सपोर्ट यूनिट
- आसपास के जनपदों में रोजाना करीब 8,000 भैंसों का कटान
- एक पशु के वजन का करीब 25% हिस्सा अपशिष्ट
- गोबर, रक्त और अन्य जैविक कचरा निकलता है
- 70 से 80% कचरे को ऊर्जा में बदला जा सकता है
- कचरा निस्तारण और प्रदूषण दोनों की समस्या घटेगी
क्या-क्या होंगे फायदे?
- बायोगैस उत्पादन 7.15 गुना तक बढ़ेगा
- मीथेन की गुणवत्ता बेहतर होगी
- उद्योगों को वैकल्पिक ऊर्जा मिलेगी
- दुर्गंध और प्रदूषण कम होगा
- ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटेगा
- एसटीपी और डेयरी कचरे में भी हो सकेगा इस्तेमाल