ये बात लगभग सवा सौ साल पहले की है। अंग्रेज अफसर जब अलीगढ़ में रेलवे ट्रैक बिछा रहे थे तो बाबा बरछी बहादुर की दरगाह के पास की कुछ जमीन की जरूरत पड़ी। अनजाने में दरगाह को भी कुछ नुकसान पहुंचा दिया गया। लेकिन जब काम शुरू हुआ तो बड़ी-बड़ी मशीनें और इंजन दरगाह के पास पहुंच कर आगे ही नहीं बढ़ पाते। कई दिनों तक कवायद हुई, लेकिन काम नहीं बना।
पूरे शहर में बात फैली तो पुराने बुजुर्गों ने बताया कि दरगाह को नुकसान पहुंचाए बिना काम हो तो यकीनन मंजिल मिलेगी। हुआ भी यही था। अंग्रेज अफसरों ने अपनी जिद छोड़ी और दरगाह को यथावत कर बाबा बरछी बहादुर की चादरपोशी कराई गई। इसके बाद जब काम शुरू हुआ तो रेलवे लाइन धड़ाधड़ बिछती गई और रेल इंजन सरपट दौड़ने लगे।
जी हां, ये कोई कही सुनी बात नहीं बल्कि अलीगढ़ के इतिहास के दस्तावेजों में दर्ज सत्य घटना है। आपको जानकर खुशी होगी कि आज भी बाबा बरछी बहादुर रेलवे ट्रैक और ट्रेनों की निगरानी कर रहे हैं। दरगाह के रेलवे ट्रैक की ओर के हिस्से में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं जिसमें ट्रेनों के साथ रेलवे ट्रैक की भी निगरानी होती है। इसका एक महीने का पूरा रिकार्ड भी मौजूद रहता है। दरगाह कमेटी ने सुरक्षा को देखते हुए सीसीटीवी कैमरे लगा कर एक रिकार्ड रूम भी बनाया है। कैमरों से विडियो फुटेज और पूरा रिकार्ड देखने की सुविधा भी मौजूद है।
‘अजमेर के ख्वाजा गरीब नवाज ने ख्वाजा कुतुबद्दीन बख्तियार काकवी को अपना शागिर्द बनाया था और बाबा बरछी बहादुर काकवी के साथी थे। बाबा बरछी बहादुर का नाम सैयद तहबुर अली था, उनके अनुयायी हजरत जोरार हसन ने सबसे पहले बरछी बहादुर पर उर्स की शुरुआत की थी। बाबा बरछी बहादुर के अलावा हजरत शमशुल आफरीन शाहजमाल की दरगाह भी अलीगढ़ के इतिहास में दर्ज बहुत पुरानी दरगाह है।’
-इमाम हाफिज नसीम खान, इमाम बाबा बरछी बहादुर
दरगाह की सुरक्षा को देखते हुए जब सीसीटीवी कैमरे लगाए गए तो एक कैमरा रेलवे ट्रैक की ओर लगाए ताकि ट्रैक और ट्रेनों की निगरानी में रेलवे की मदद की जा सके। ये बाबा की दुआ है कि आज तक अलीगढ़ रेलवे स्टेशन से कठपुला की ओर कोई भी रेल हादसा नहीं हुआ है। सवा सौ साल से बाबा यहां के मालिक और पहरेदार हैं। दरगाह में आने वाले जायरीनों के लिए भी सुरक्षा बढ़ाई गई है।
-नूर मोहम्मद, सेक्रेटरी बाबा बरछी बहादुर दरगाह