मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्भकारों के रोजगार पर संकट मडरा रहा है। हालांकि, प्रदेश सरकार ने वर्ष 2018 में माटी कला बोर्ड का गठन किया था ताकि मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्भकार आत्मनिर्भर हो सकें। इसलिए उनको इलेक्ट्रिक चाक बांटे गए थे। लेकिन बाजार में प्लास्टिक के बर्तनों की भरमार होने से मिट्टी के बर्तन बाजार में नहीं बिक पा रहे हैं। वहीं, मिट्टी महंगी होने से भी कुम्भकारों के अरमान टूट रहे हैं। उनको परिवार चलाना मुश्किल पड़ रहा है।
मिट्टी महंगी होने के कारण कुल्हड़, प्लेट, सुराही, मटके आदि के दाम बढ़ गए हैं। ऐसे में विकल्प के तौर पर लोगों ने प्लास्टिक की प्लेट, कप, गिलास, कटोरी इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। एटा चुंगी बाईपास स्थित गोविंद नगर निवासी कुम्भकार कैलाश चंद्र ने बताया कि वह 20 सालों से मिट्टी के बर्तन बना रहे हैं। पहले मिट्टी की बुग्गी 200 से 250 रुपये में आती थी। पिछले दो साल में इसके दाम दोगुना हो गए हैं। अब 500 से 600 रुपये में बुग्गी आ रही है। लेकिन कुल्हड़ की दरों में केवल 20 से 30 रुपये सैकड़ा का इजाफा हुआ है। डेढ़ साल पहले सरकार से इलेक्ट्रिक चाक पाने की आस में फार्म भरा था। लेकिन आज तक उन्हें चाक नहीं मिला। नौरंगाबाद छावनी निवासी विपिन कुमार का भी कुछ यही हाल है।
ई-चाक तो मिला, लेकिन रोजगार नहीं
गोविंद नगर निवासी उदय राम सिंह बताते हैं कि उनके माली कला बोर्ड द्वारा उन्हें डेढ़ साल पहले इलेक्ट्रिक चाक तो मिला है। इससे उनकी मेहनत कम हुई है। लेकिन रोजगार पर कोई असर नहीं पड़ा है। वह कहते हैं कि सरकार जब तक पूर्ण रूप से प्लास्टिक पर बैन नहीं लगाएगी। तब तक मिट्टी के कामगारों का उद्धार होना असंभव है। नौरंगाबाद छावनी के धर्मेंद्र बताते हैं कि डेढ़ साल पहले उन्हें भी सरकारी योजना के तहत इलेक्ट्रिक चाक मिला था। लेकिन इससे रोजगार पर कोई असर नहीं पड़ा। अब परिवार का लालन पालन करना मुश्किल हो गया है।
युवा पीढ़ी का रुझान हटा
पुश्तैनी काम कर रहे कुम्भकार महेश चंद्र ने बताया कि अब युवा पीढ़ी मिट्टी का काम करने से डरती है। उनका कहना है कि इतनी मेहनत करने के बाद भी उनको वाजिब पैसे नहीं मिलते हैं। इससे अच्छा है कि वो मजदूरी कर अपने परिवार का भरण पोषण करें। वह बताते हैं कि बाजार में ठंड के चलते केवल कुल्हड़ की डिमांड है। बाकी अन्य सामान की कोई डिमांड नहीं है।