फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विदेशी विद्वान भी सर सैयद की काबिलियत के थे कायल

विज्ञापन
सर सय्यद डे पर लाइटों से जगमगाती एएमयू लाइब्रेरी। संवाद - फोटो : CITY OFFICE
विज्ञापन
इकराम वारिस, अलीगढ़।
विज्ञापन

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के संस्थापक सर सैयद की 205वीं जयंती 17 अक्तूबर को है। सर सैयद की काबिलीयत के विदेशी विद्वान सी विलियम ट्रॉल और एचआर गिब भी कायल थे। दोनों विद्वानों ने सर सैयद और एएमयू की शान में कसीदे पढ़ चुके हैं।
सैयद अहमद खान को सर सैयद बनने में तमाम आजमाइश से गुजरना पड़ा है। 1857 में सर सैयद तीन तरफ से घिर गए। एक तरफ सर सैयद मुसलमानों के निशाने पर आ गए थे, तो दूसरी तरफ अंग्रेज हिंदुस्तानियों के खून के प्यासे थे, जिन्हें बचाना था और तीसरा देश का बहुसंख्यक समाज सर सैयद की आलोचना कर रहा था। इनके सबके बावजूद सर सैयद अपने मिशन की तरफ बढ़ते गए।
विज्ञापन

एएमयू के उर्दू एकेडमी के पूर्व निदेशक डॉ. राहत अबरार ने बताया कि सर सैयद द्वारा स्थापित एएमयू को विदेशी विद्वान सी विलियम ट्रॉल ने इस्लामी जगत की पहली संस्था बताया था, जबकि एचआर गिब ने सर सैयद को मुस्लिम आधुनिक शिक्षा का पितामह कहा था। डॉ. अबरार ने कहा कि 1857 की क्रांति पर सर सैयद अहमद ने तीन किताबें लिखीं। इनमें तारीख-ए-सरकशी-ए-बिजनौर, असबाब-ए-सरकशी-हिंदुस्तान का जवाब मजमून और लॉयल मोहम्मडन ऑफ इंडिया शामिल हैं।
सर सैयद के बेटों ने की जीआईसी में पढ़ाई
सर सैयद अहमद जब 1864 में गाजीपुर से स्थानांतरित होकर अलीगढ़ आए, तब उन्होंने अपने दोनों बेटे हामिद और महमूद को मिडिल ग्रामर स्कूल में दाखिला कराया, जो अब नौरंगीलाल राजकीय इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाता है। शेख अब्दुल्ला अपनी किताब में लिखते हैं कि जब वह लाहौर से ट्रेन के जरिये अलीगढ़ पहुंचे तो वह एमएओ कॉलेज आना चाहते थे, लेकिन कुली उन्हें मिडिल ग्रामर स्कूल ले आया। उस समय भी यह स्कूल काफी मशहूर था।
सर सैयद डे पर मुख्य अतिथि होंगे प्रो. महमूद
एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद की 205वीं जयंती (सर सैयद डे) पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. ताहिर महमूद, विशिष्ट अतिथि जस्टिस इकबाल अहमद अंसारी व राष्ट्रीय आर्काइव के महानिदेशक चंदन सिन्हा होंगे।
यातायात व्यवस्था में होगा बदलाव
सोमवार को सर सैयद डे पर सुबह 10 बजे से गुलिस्तान-ए-सर सैयद में मुख्य कार्यक्रम के लिए आवागमन के चलते एएमयू के बाब-ए-सैयद द्वार व शताब्दी द्वार (पुरानी चुंगी) प्रात: 10:30 बजे से 11:00 बजे तक पूर्णतया बंद रहेंगे। इस अवधि में मेडिकल कॉलेज या उस ओर जाने वाले लोगों की सुविधा के लिए वैकल्पिक मार्ग खुले रहेंगे, जिसमें हबीब हाल गेट वाया मेडिकल कॉलोनी, ठंडी सड़क, नकवी पार्क, वाया एडीएम कंपाउंड और जमालपुर से वाया नाला रोड शामिल हैं।
सर सैयद का सुधारवादी दर्शन
- प्रो. तारिक मंसूर, कुलपति
आधुनिक भारत के महान चिंतक, हमारे राष्ट्र निर्माताओं में से एक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद खान इस दृष्टि से एक विलक्षण व्यक्ति थे। उन्होंने अपने लगभग 50-55 वर्षीय क्रियाशील जीवनकाल में भारतीय समाज के उन सभी क्षेत्रों में आधुनिकता व सुधारवादी दर्शन के साथ कार्य किया, जिससे देश की चहुंमुखी प्रगति संभव हो सकती थी।
सर सैयद को शिक्षा बहुत प्रिय थी और उन्होंने शिक्षा को सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवर्तन लाने का सबसे प्रभावी माध्यम माना। उनके लिए आधुनिक पश्चिमी ज्ञान को अपनाना सभी बीमारियों के लिए रामबाण था। सर सैयद ने अपनी शिक्षा की योजना को चित्रित करते हुए 16 लेखों का योगदान दिया, जो स्वतंत्र जांच, उदारवादी सहनशीलता और नैतिकता के उच्च मानकों पर केंद्रित थी।
सर सैयद ने कभी राष्ट्रीय स्वाभिमान के मुद्दे पर समझौता नहीं किया, जो उनके विचार में एक व्यक्ति का सबसे सम्मानित और अमूल्य अधिकार था। सर सैयद ने कभी-कभी ब्रिटिश शासन की अत्यधिक प्रशंसा अवश्य की, लेकिन उन्होंने उन ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ कठोरता के साथ लिखा, जिन्होंने अपने भारतीय अधीनस्थों के साथ क्रूरता व बर्बरता का बर्ताव किया।
सर सैयद ने भारतीय समाज की धर्मनिरपेक्ष साख और अंतरधार्मिक दृढ़ता को कायम रखते हुए जीवन के तरीके के रूप में बहुलवाद पर विशेष जोर दिया। उन्होंने पवित्र बाइबिल की व्याख्या लिखने का भी प्रयास किया और एक तर्कसंगत, बहुआयामी और मानवीय समाज की स्थापना के लिए इस्लाम की नैतिक और सामाजिक प्रतिबद्धता को उजागर करके धर्म की एक ठोस और तार्किक व्याख्या देने की मांग की।
उन्होंने लोगों को यह समझाने का प्रयास किया कि असहिष्णुता, क्रूरता और कट्टरता धार्मिक आस्था की बुनियाद नहीं हो सकती। उनके लिए धर्म का अर्थ स्वतंत्र जांच की भावना का पोषण करना था और इसके लिए एक बहु सांस्कृतिक समाज का निर्माण ही एकमात्र विकल्प था, जहां शांति जीवन का एक अनिवार्य तरीका हो।
हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक सर सैयद
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी शुरू से ही धर्मनिरपेक्ष गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतिनिधित्व करती आ रही है और एएमयू समुदाय शिक्षा के इस महान मीनार की पहचान बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। सर सैयद अहमद खान ने देश में हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया और सारा जीवन समुदाय के शैक्षिक उत्थान और एक आधुनिक भारत के बहुलवादी समाज को मजबूत बनाने के लिए काम किया।
विज्ञापन

सर सैयद अहमद खान हिंदू-मुस्लिम एकता के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण और अति प्रभावशाली नाम है। हालांकि, इस संबंध में उनके योगदान पर लोगों में मतभेद पाए जाते हैं, जब सर सैयद ने गाजीपुर में एक मदरसा खोला तो उन्होंने राजा देव नारायण सिंह और मौलाना मोहम्मद फसीह को आधारशिला रखने के लिए आमंत्रित किया। यह हिंदुओं के प्रति उनकी आत्मीयता और सम्मान का प्रतीक था।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें