बाल मजदूरी करने वाले बच्चों को जबरन रोका गया तो वे भविष्य में भिखारी तक बनने को मजबूर हो सकते हैं। ऐसे बच्चों के परिजनों को आर्थिक सपोर्ट देेने और बच्चों की शिक्षा की समुचित व्यवस्था करने की जरूरत है। यह निष्कर्ष एएमयू में हुए एक शोध में निकला है।
भूगोल विभाग के डॉ. सैयद वसीम अशरफ के निर्देशन में डॉ. अयाज अहमद ने बाल मजदूरों की सामाजिक एवं आर्थिक अधि संरचना पर तुलनात्मक अध्ययन किया। 2306 बाल मजदूरों के घरों का सर्वे किया, जिसमें 3230 बाल मजदूर निकले। इन्हें 8 वर्ग में विभक्त कर अध्ययन किया गया। सर्वाधिक 41 प्रतिशत बाल मजदूर ताला उद्योग से जुड़े थे। 21 प्रतिशत बच्चे होटल-ढाबों पर काम करते पाए गए। ताला उद्योग में काम करने वाले बच्चे लंस समेत अन्य कई तरह की बीमारियों से ग्रसित थे। डॉ. अयाज अहमद का कहना है कि 60 प्रतिशत बच्चे गरीबी की वजह से बाल मजदूर बने हैं। 22 प्रतिशत ऐसे हैं जिनके अभिभावक उदासीन हैं। 21 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें पढ़ाई में मजा नहीं आता है। 12 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जिनके पिता नहीं हैं। वहीं 15 प्रतिशत को पढ़ाई के बदले काम करने और पैसा कमाने में मजा आता है।
जबरन बाल मजदूरी रोकने पर बच्चों के भिखारी बनने का खतरा है। ऐसे में बाल मजदूरी करने वाले बच्चों के परिजनों को आर्थिक सहायता की जरूरत है। इसके साथ ही अच्छे वातावरण में बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था करना जरूरी है। बहुत से बच्चे ऐसे हैं जिनके घर में काम करने वाला नहीं है। ऐसे लोगों के लिए आय का साधन सृजित किया जाए। अभिभावकों को स्कालरशिप के साथ शार्ट टर्म तकनीकी शिक्षा दी जाए, ताकि आय होती रहे।
- डॉ. सैयद वसीम अशरफ, शिक्षक भूगोल विभाग
2009-10 में 2306 बाल मजदूरी करने वाले बच्चों के घरों का सर्वे किया। भयावह स्थिति थी उनके घरों की। इन घरों में 3230 बाल मजदूर मिले। बहुत से बच्चे तो ऐसे थे, जिनके सिर पर पिता का छाया नहीं है और परिवार में आय का कोई स्त्रोत नहीं है। फैक्ट्री में काम करने, रिक्शा चलाने एवं कूड़ा चुनने आदि से उनकी सेहत को बड़ा नुकसान हो रहा है। आर्थिक तंगी के कारण अभिभावक बच्चों को काम पर लगा देते हैं। सरकार के साथ ही समाज का सपोर्ट भी जरूरी है।
- डॉ. अयाज अहमद, शोध छात्र