महिला मरीज की जांच में पता चला कि वह जीयूटीबी नामक बीमारी से ग्रस्त है। टीबी यानी तपेटिक के चलते होने वाली यह बीमारी जननांगों को प्रभावित करती है। यह अक्सर प्राथमिक संक्रमण के पांच से 25 वर्ष बाद होता है, जिससे मूत्र में बिना रिसाव के पेशाब आना, बार-बार पेशाब आना और दर्द जैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं।
अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज में पहली बार चार विभागों के एक दर्जन से ज्यादा डॉक्टरों ने मिलकर दुर्लभ ऑपरेशन में सफलता हासिल की है। डॉक्टरों ने एक 26 वर्षीय महिला मरीज को नया जीवन दिया है जो जननांग-मूत्र संबंधी तपेदिक (जीयूटीबी) बीमारी से ग्रस्त थी। इस परेशानी के चलते मूत्रवाहिनी यानी यूरेटर चोटिल हुआ जिसके चलते डॉक्टरों ने मिनिमली इनवेसिव यानी बेहद छोटा चीरा लगाने की तकनीक का इस्तेमाल करते हुए सर्जरी में सफलता हासिल की।
विज्ञापन
डॉक्टरों के अनुसार, महिला मरीज की जांच में पता चला कि वह जीयूटीबी नामक बीमारी से ग्रस्त है। टीबी यानी तपेटिक के चलते होने वाली यह बीमारी जननांगों को प्रभावित करती है। यह अक्सर प्राथमिक संक्रमण के पांच से 25 वर्ष बाद होता है, जिससे मूत्र में बिना रिसाव के पेशाब आना, बार-बार पेशाब आना और दर्द जैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं।
मेडिकल कॉलेज के सर्जरी विभागाध्यक्ष प्रो. अतिया जका उर रब और डॉ. परवेज आलम की टीम ने पहले टीबी संक्रमण से जुड़ा उपचार शुरू किया जिसमें चेस्ट मेडिसिन से शुरू डॉक्टर शामिल हुए। इसके बाद सर्जरी और फिर प्लास्टिक सर्जरी के विशेषज्ञों का सहयोग भी लिया गया। इस टीम में यूरोलॉजी से जुड़े विशेषज्ञ भी रहे। डॉ. परवेज आलम के अनुसार, यूरेटर वह बारीक नली होती है जो किडनी से पेशाब को मूत्राशय तक पहुंचाती है। यदि इसमें घाव या कट लग जाए, तो शरीर की पूरी उत्सर्जन प्रणाली ठप हो सकती है।
विज्ञापन
यह चुनौतीपूर्ण स्थिति रहती है। टीबी उपचार के साथ मरीज की किडनी को सुचारु रखने के लिए एक अस्थायी ट्यूब लगाई। दो महीने बाद जब मरीज स्थिर हुई तो ऑपरेशन की प्रक्रिया शुरू हुई। डॉ. परवेज आलम ने दावा किया है कि इस तरह का ऑपरेशन मेडिकल कॉलेज में पहले कभी नहीं हुआ है। पारंपरिक ओपन सर्जरी के मुकाबले इस आधुनिक तकनीक के कई फायदे हैं। मरीज को बहुत छोटा चीरा लगाया गया।खून बहुत कम बहा और दर्द कम हुआ मरीज बहुत जल्दी रिकवर होकर अपने सामान्य जीवन में लौट सकेगा।
सबसे बड़ी चुनौती बोआरी फ्लैप
ऑपरेशन के दौरान प्रभावित हिस्से को फिर से तैयार करने के लिए योजना बनाई। इसे बोआरी फ्लैप रिकंस्ट्रक्शन कहा जाता है। इसमें डॉक्टरों ने मूत्राशय के ही हिस्से का उपयोग करके नया फ्लैप बनाया और उससे क्षतिग्रस्त हिस्से पर लगाया गया। इसमें श्वार्ज हिच तकनीक का सहारा लिया। जब पेशाब की नली (यूरेटर) टीबी या किसी चोट के कारण पूरी तरह गल या कट जाती है, तो उसे मूत्राशय की दीवार से नया मांस लेकर दोबारा जोड़ना बोआरी फ्लैप कहलाता है। इसे बिना बड़ा चीरा लगाए छोटे छेदों के जरिए करना डॉक्टरों की बड़ी कुशलता को दर्शाता है।