यह है वीडियोग्राफी को लेकर नियम
इस मामले में नियम कहता है कि रात्रिकालीन पोस्टमार्टम कराने पर या दिन में पैनल के जरिये पोस्टमार्टम होने पर सुप्रीम कोर्ट के नियम के अनुसार पूरी पोस्टमार्टम प्रक्रिया की वीडियोग्राफी कराई जाती है। इस वीडियोग्राफी के फुटेज चिप में पुलिस अपने पास सुरक्षित रखती है और जरूरत पर न्यायालय में पेश किए जाते हैं। इसके लिए पुलिस ने एक प्राइवेट वीडियोग्राफर तय कर रखा है, जब भी जरूरत होती है, उसे बुलाया जाता है। उसने 3000 रुपये अपना मेहनताना तय कर रखा है। परिचय के अनुसार कम ज्यादा कर लेता है। वह कभी पुलिस से तो कभी परिजनों से रुपये ले लेता है।
ये हैं सरकार के निर्देश
वर्ष 2025 जून माह में प्रदेश के डिप्टी सीएम व प्रमुख सचिव स्वास्थ्य के स्तर से पोस्टमार्टम प्रक्रिया को लेकर एक गाइडलाइन जारी की गई। जिसमें कहा गया कि स्वास्थ्य विभाग पोस्टमार्टम प्रक्रिया के लिए हर जिले में दो शव वाहन रखेगा। जो शवों को लाने ले जाने का काम करेंगे। शवों की वीडियोग्राफी पर आने वाला खर्च जिला स्तर पर गठित रोगी कल्याण समिति करेगी। परिवार से किसी तरह का कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा। इसके अलावा इससे पहले का एक नियम यह भी है कि पुलिस द्वारा फॉरेंसिक टीम के वीडियोग्राफर से वीडियोग्राफी कराई जाएगी।
एक दशक बाद फिर बिगड़ी व्यवस्थाएं
वर्ष 2008 में यहां पोस्टमार्टम के पीछे तालाब में नरमुंड मिले थे। जिस पर शोर मचने के बाद तत्कालीन डीएम-एसएसपी, सीएमओ स्तर से प्रयास कर सामाजिक संगठन मानव उपकार से शवों के अंतिम संस्कार शुरू कराया गया। उन्हीं के प्रयास से मानव उपकार को 2400 रुपये प्रति शव के हिसाब से 2010 में बजट मिलना शुरू हो गया। 2020 तक उन्हें बजट मिला। इसके बाद कभी 20 तो कभी 30 शव का बजट मिलने लगा। इसके बाद उन्होंने लेना बंद कर दिया, लेकिन निशुल्क अंतिम संस्कार आज भी कर रहे। साथ में वे अज्ञात शवों को कफन व पॉलिथीन भी दे रहे हैं।
लाविरस शवों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था
- 2010 के बाद से जिले में अंतिम संस्कार के लिए बजट मिलने का हुआ प्रावधान
- 2400 रुपये प्रति अज्ञात शव के अंतिम संस्कार को मिलता था 2020 तक बजट
- 200 से 250 औसत अज्ञात शवों का प्रतिवर्ष मानव उपकार करती अंतिम संस्कार
- 2020 के बाद 25 से 30 शवों के अंतिम संस्कार का बजट ही पास होकर आया है
- सामाजिक संगठन ने बजट लेना बंद किया, अब निशुल्क कर रहे हैं संस्कारयह नियम भी जानिए
- शव मिलने पर उसे संरक्षित करने के लिए किट शासन से आती हैं और थानावार वितरित होती हैं। -जिले में कहीं से भी शवों को पोस्टमार्टम तक पहुंचाने के लिए स्वास्थ्य विभाग के दो वाहन होते हैं। -पोस्टमार्टम में वीडियोग्राफी की जरूरत पर पुलिस व्यवस्था करे या रोगी कल्याण समिति खर्च करे। -पोस्टमार्टम प्रक्रिया में बिना किसी खर्च या वसूली के शव पोस्टमार्टम के बाद परिजनों दिया जाता है।
यहां की अव्यवस्था जानिए
- शव स्वास्थ्य विभाग की एंबुलेंस के बजाय पुलिस निजी वाहनों से लेकर पोस्टमार्टम केंद्र पहुंचती है।
- बड़ी घटनाओं में ही स्वास्थ्य विभाग की एंबुलेंस पुलिस के सहयोग के लिए मौके पर पहुंच पाती है।
- वीडियोग्राफी निजी व्यक्ति से कराई जाती है, जिसमें कभी पुलिस या कभी परिजन रुपये खर्च करते हैं।
- शव के विसरा प्रिजर्व करने पर कई बार जार या अन्य सामान के रुपये परिजनों से वसूले लिए जाते हैं।