कैंसर, मधुमेह, हृदय रोग और एंटीबायोटिक्स जैसी जरूरी 800 दवाएं 1 अप्रैल से महंगी हो जाएंगी। सरकार ने जरूरी दवाओं की लिस्ट यानी एनएलईएम (नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिंस) में शामिल दवाओं के दाम में 1.74 फीसदी तक बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है।
मधुमेह जैसी बीमारियों में रोजाना दवाइयों की जरूरत होती है। कीमतों में यह बढ़ोतरी मरीजों के मासिक बजट को प्रभावित कर सकती है। हालांकि यह वृद्धि ज्यादा नहीं है, लेकिन ऐसे ही बढ़ोतरी होती रही तो यह समस्या बन सकती है। सरकार को जन औषधि केंद्रों का विस्तार कर सस्ती दवाएं उपलब्ध कराना चाहिए।-डॉ. संजय तायल, वरिष्ठ फिजिशियन
एंटीबायोटिक्स दवाओं की कीमतों में वृद्धि से गरीब मरीजों के इलाज पर असर पड़ सकता है। अगर कीमतें बढ़ती हैं तो लोग बिना डॉक्टर की सलाह से कम प्रभावी दवाओं का इस्तेमाल करेंगे। सरकार को एंटीबायोटिक्स दवाओं को लेकर ठोस नीति बनानी चाहिए।-डॉ. मयंक मनी, वरिष्ठ फिजिशियन।विज्ञापन
दवाओं की कीमतों में प्रस्तावित वृद्धि थोक मूल्य सूचकांक में बदलाव के अनुरूप है, मगर हमें यह ध्यान रखना होगा कि बड़ी संख्या में लोग निम्न और मध्यम वर्ग से आते हैं। ऐसे में जरूरी दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी उनके लिए आर्थिक बोझ बढ़ा सकती है। सरकार को मूल्य नियंत्रण पर ध्यान देना चाहिए।-डॉ. भरत कुमार वार्ष्णेय, प्रेसिडेंट आईएमए।
हर साल कुछ दवाओं की कीमतों में बढ़ोत्तरी तो कुछ में कमी होती है। इसकी पूरी सूची जारी होने के बाद ही तस्वीर साफ हो सकेगी। फार्मा कंपनियों का कहना है कि कच्चे माल की कीमतें, यानी दवा बनाने वाले कंपोनेंट्स के दाम पिछले कुछ समय से बढ़ रहे थे, इसकी वजह से लागत बढ़ गई है।-शैलेंद्र सिंह टिल्लू, अध्यक्ष जिला अलीगढ़ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोसिएशन।