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डॉ.कफील ने भेजा जवाब, डीआरडी गोरखपुर का लिया हिसाब

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डॉ कफील खान। - फोटो : CITY OFFICE
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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भड़काऊ भाषण मामले में रासुका में निरुद्ध गोरखपुर के डॉ. कफील ने रासुका निरुद्ध आदेश पर अपना जवाब (प्रत्यावेदन) भेज दिया है। जिला मजिस्ट्रेट से लेकर प्रदेश व केंद्र के गृह विभाग के अलावा उत्तर प्रदेश परामर्शदात्री परिषद को भेजे अपने जवाब में उन्होंने साफ-साफ कहा है कि उन्हें गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में व्याप्त भ्रष्टाचारों के खिलाफ आवाज उठाने की सजा मिल रही है। उन्होंने कहा है कि एक ही रात में शासन के दबाव में मशीनरी ने रासुका निरुद्ध आदेश तैयार किया और रिहाई आदेश जेल प्रशासन को मिलने के बाद भी उस आदेश को दरकिनार कर उन्हें रिहा नहीं किया गया। यह दर्शाता है कि देश में अघोषित आपात काल के हालात हैं। अधिवक्ता के जरिये 30 बिंदुओं में बनाए गए जवाब के अंत में उन्होंने इस रासुका निरुद्ध आदेश को शून्य घोषित करने का अनुरोध किया है।
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डॉ. कफील पुत्र शकील खान निवासी 172 बसंतपुर थाना राजघाट गोरखपुर के अधिवक्ता इरफान गाजी के अनुसार डॉ. कफील ने मथुरा जिला कारागार के जेलर के माध्यम से जिला मजिस्ट्रेट अलीगढ़ को संबोधित अपना प्रत्यावेदन चारों जगह के लिए भेज दिया है। इस जवाब की शुरुआत में ही उन्होंने कहा है कि यह निरुद्ध आदेश संविधान के विरुद्ध है। जवाब के अनुसार उन्हें एएमयू बयान मामले में सिविल लाइंस में दर्ज मुकदमे में मुंबई एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया था। इस मामले में जमानत भी मंजूर मंजूर हो गई। बावजूद इसके 13 फरवरी को मशीनरी तरीके से उनके खिलाफ रासुका निरुद्ध आदेश पारित किया गया। खास बात है कि 10 फरवरी को उसकी जमानत मंजूर हो गई। 12 को रिहाई आदेश जेल पहुंचा, जिसे माना नहीं गया तो 13 फरवरी को विशेष संदेशवाहक से दूसरा रिहाई आदेश जेल पहुंचा। मगर साजिश के तहत उन्हें रिहा नहीं किया गया और साजिश के तहत 14 फरवरी की सुबह सात बजे उन्हें निरुद्ध आदेश रिसीव कराया गया। इस तरह यह आदेश अपास्त किए जाने योग्य है। साथ में उन्होंने खुद को हृदय रोगी बताते हुए कहा है कि उन्हें जेल में समुचित उपचार भी नहीं मिल रहा है। बता दें कि एएमयू में बयान देने पर मुकदमा दर्ज होने के बाद कफील को गिरफ्तार किया गया था और मथुरा जेल भेजा गया। इसी मामले में उन्हें शहर में बवाल का जिम्मेदार मानते हुए और रिहा होने पर फिर लोगों को भड़काने के अंदेशे पर रासुका में पाबंद किया गया है।
13 तारीख में ही लगी सभी अफसरों की रिपोर्ट
अधिवक्ता के अनुसार रासुका निरुद्ध आदेश पर सवाल उठाते हुए कफील ने कहा है कि उन पर रासुका लगाने संबंधी एलआईयू सहित इंस्पेक्टर सिविल लाइंस, सीओ तृतीय, एसपी सिटी, एसएसपी आदि सभी अधिकारियों की संस्तुति रिपोर्ट 13 फरवरी में ही लगी हैं। सभी ने उस पर मिथ्या आरोप लगाए हैं। इससे साफ है कि यह मशीनरी का दुरुपयोग कर शासन के दबाव में किया गया है। साथ में इससे मंशा भी स्पष्ट होती है। इस तरह यह आदेश खारिज होने योग्य है।
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एक फोन किसका आया, जिस आदेश पर लगा रासुका
अधिवक्ता के अनुसार कफील ने अपने जवाब में कुछ मीडिया रिपोर्टों का उल्लेख किया है कि जिसमें उल्लेख है कि जमानत होने के बाद 13 फरवरी की रात एक ऐसा फोन आया, जिसके आधार पर रात भर में उनके खिलाफ यह आदेश तैयार किया गया और उन्हें पाबंद कर दिया गया। ऐसे में यह स्पष्ट किया जाए कि वह फोन किसका था और क्यों ऐसा किया गया।
शासन को खुश करने के लिए किया यह आदेश
वकील के अनुसार उन्होंने कहा है कि गोरखपुर कांड के बाद पूर्व में उन पर मुकदमे दर्ज कराए गए, जिसमें वह जमानत पर हैं और कहीं से दोषी नहीं है। इसलिए उन्हें अपराधी नहीं कहा जा सकता। इसलिए यह मौका मिलने पर उनके खिलाफ वर्तमान शासन को खुश करने के लिए यह किया गया है।
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30 बिंदुओं में डॉ. कफील ने किए यह पलटवार
-वह उच्च शिक्षित डॉक्टर है, उससे समाज को कोई खतरा नहीं है
-उसने ऐसा कोई बयान नहीं दिया, जिससे देश की सुरक्षा को खतरा हो
-संविधान की धारा 19 में सभी को अपनी बात कहने का अधिकार है
-अगर यह आपातकाल नहीं है तो लगाए गए सभी आरोप आरोप गलत हैं
-जमानत होने के बाद भी उसे हिरासत में रखा, इसलिए आदेश गलत है
-वह गोरखपुर से हैं, 700 किसी दूर एएमयू-अलीगढ़ से उनका कोई नाता नहीं
-गलत तरीके से मुकदमा दर्ज कर बिना 41 का नोटिस दिए गिरफ्तार किया
-यह सब गोरखपुर मेडिकल में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने का नतीजा ही तो है
-वहां बच्चों की मौत का मुद्दा उठाने से सीधे सरकार कटघरे में खड़ी होती है
-इसी के चलते साजिश के तहत उसे यहां बयान देने पर मुकदमे में फंसाया
-12 को वह बयान देकर चला गया, इसके बाद यह मुकदमा दर्ज किया गया
-9 दिसंबर से जारी विरोध के क्रम में 13 को छात्रों ने प्रदर्शन किया था
- जामिया के रिएक्शन में 15 को प्रदर्शन हुआ, जिस पर बल प्रयोग हुआ
- मीडिया रिपोर्टों में अगले ही दिन इन घटनाओं का स्पष्ट उल्लेख किया गया
-इन घटनाओं के मुकदमों से भी उनका किसी तरह से कोई सरोकार नहीं है
-वह न कभी देहली गेअ के शाहजमाल गए और 29 से पुलिस हिरासत में हैं
-एएमयू में धरना 9 दिसंबर से चल रहा है, फिर वह इसके लिए जिम्मेदार क्यों
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