देश में खेल नीति ही नहीं तो कहां से निकलेंगे ओलंपियन
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एक अरब से ऊपर की आबादी वाले देश और ओलंपिक में मात्र दो मैडल। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे। सवाल उठता है कि क्या हमारे देश में खेल प्रतिभाओं की कमी है या हमारे खिलाड़ी किसी से प्रदर्शन के मामले में कमतर हैं। नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है।
दरअसल सुविधाओं और कल्चर के अभाव में अच्छी प्रतिभाएं या तो स्थानीय स्तर पर बदहाली से तंग आकर दम तोड़ देती हैं, या फिर प्रोत्साहन न मिलने से उनकी अच्छा करने की इच्छाशक्ति ही मर जाती है।
खेलों की इस दुर्दशा का अंदाजा उत्तर प्रदेश ओलंपिक संघ सचिव व भारतीय एवं उत्तर प्रदेश हैंडबाल संघ के महासचिव आनंदेश्वर पांडेय के बयान से लगाया जा सकता है। उनके मुताबिक देश में खेल नीति ही नहीं है। न केंद्र और न ही राज्य सरकारों के स्तर पर इस ओर ध्यान नहीं दिया गया है।
देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, लेकिन सरकारों का ध्यान शिक्षा व स्वास्थ्य समेत अन्य सुविधाओं पर तो है, जबकि खेलों को दूसरे दर्जे में रखा जाता है। जबकि ओलंपिक में छाए रहने वाले अमेरिका, चीन समेत अन्य देशों में खेलों के मुकाबले शिक्षा व स्वास्थ्य का बजट कम है।
हैंडबाल को ही लीजिए उत्तर प्रदेश के ही अधिकांश जनपदों में में हैंडबाल की एक इकाई तक नहीं है और न ही स्पांसर। इन समस्याओं से निपटने एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर प्रदर्शन को स्पोर्ट्स कल्चर डेवलेप होना आवश्यक है।
हैंडबाल को बढ़ावा देने के लिए आईपीएल एवं आईबीएल की तर्ज पर महाराष्ट्र में एक लीग हुई थी। इसमें विदेशी स्टार खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। अब इसे राष्ट्रीय स्तर पर कराने के प्रयास हो रहे हैं।