मछलियों पर होने वाले हानिकारक प्रभाव का अध्ययन एएमयू के जंतु विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. हुमा वसीम करेंगी। शोध के लिए वैज्ञानिक व औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने 40 लाख रुपये का अनुदान दिया है। उन्हें यह शाेध तीन साल में पूरा करना है।
डॉ. हुमा को इमर्जिंग इन्वेस्टिगेटर्स रिसर्च (ईएमआर) और एएसपीआईआरई योजना के तहत अनुदान मिला है। डॉ. हुमा ने बताया कि प्लास्टिक को बनाने में बहुत से रसायन का इस्तेमाल होता है। इन्हीं में एक रासयन का इस्तेमाल मछलियों पर किया जाएगा। विभाग की प्रयोगशाला में मछलियों पर शोध होगा। रसायन को बाजार से लाई गई मछली पर डालकर यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि रसायन का असर क्या पड़ रहा है? उन्होंने कहा कि मछलियों को जो भोजन दिया जाता है, उसमें रसायनिक पदार्थों की मिलावट होती है। इन मछलियों के सेवन से व्यक्तियों को कैंसर सहित अन्य बीमारियों से जूझना पड़ता है।
डॉ. हुमा ने कहा कि इसके अलावा इस अनुदान के जरिये पानी को भी साफ करने की योजना पर काम करेंगी। नदी और तालाब का पानी प्लास्टिक की वजह से प्रदूषित हो जाता है। प्लास्टिक बनाने में इस्तेमाल होने वाले रसायन को मानक के अनुरूप पानी में मिलाएंगे। फिर उसमें फंगस बढ़ाएंगे, जो पानी प्रदूषित को खींचकर उसे शुद्ध कर देगा। डॉ. हुमा ने कहा कि इससे पहले यूजीसी ने नैनो पार्टिकल्स के लिए 10 लाख रुपये का अनुदान दिया था।