चंदपा कांड ने पूरे देश को आक्रोशित किया है। बेटियों की सुरक्षा को लेकर सभी चिंतित हैं। लेकिन दूसरी ओर समाज का एक वर्ग इस दुखद घटना को सच मानने को तैयार नहीं है। इन लोगों का दावा है कि आरोपी बनाए गए लोगों में से तीन तो बिल्कुल निर्दोष हैं। किसी भी घटना में आरोपी पक्ष इसी तरह अपने को निर्दोष बताता है। हकीकत क्या है, वह तो जांच एजेंसियां पता करेंगी, लेकिन कुछ ऐसे सवाल जरूर हैं, जिनका जवाब मिले तो घटनाक्रम पर पड़ा कुहासा छंट सकता है और सच सामने आ सकता है। जब सच सामने आएगा, तभी बेटी को न्याय मिल पाएगा।
सवाल नंबर 1
- क्या हुआ घटनास्थल पर
14 सितंबर की सुबह करीब 9.30 बजे घटनास्थल पर क्या हुआ? इसे लेकर जितने मुंह उतनी बात वाली कहावत सामने आ रही है। घटना के बाद सबसे पहले बाइक पर सवार होकर खुद थाने पहुंचीं मां-बेटी का आरोप कि एक नामजद ने आकर बेटी पर हमला बोला। 19 तारीख को दूसरा आरोप लगाया कि छेड़खानी भी की गई। 22 सितंबर को तीसरा आरोप, कुल चार नामजदों ने दुष्कर्म कर हमला किया। तीन बार में पूरे बयान देकर खुद परिवार ने ही मूल घटना को एक यक्ष प्रश्न बना दिया। आरोपी इसे अपने पक्ष में भुना रहे हैं।
सवाल नंबर 2
- घटना के वक्त कहां थी चारों आरोपियों की लोकेशन
पहली तहरीर में एक नामजद को हमले के लिए मौके पर होना बताया गया और तीसरी बार के आरोप में तीन अन्य आरोपियों को भी दुष्कर्म में शामिल होना बताया गया। आरोपी पक्ष का दावा है कि मुख्य नामजद घटना के समय अपने पिता के साथ जानवरों को पानी पिला रहा था। एक नामजद चंदपा के पास चिलर प्लांट में नौकरी करने गया हुआ था। एक अन्य नामजद के बारे में दावा किया जा रहा है कि घटना के वक्त मौके पर मौजूद उसकी मां ने बिटिया संग मारपीट होने पर घर से पानी लेकर बुलाया था। सवाल यह है कि सच कौन बोल रहा है?
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सवाल नंबर 3
क्या सांसद की बेटी मंजू के आने के बाद बदले गए बयान
यह भी एक बड़ा सवाल आरोपी पक्ष की ओर से खड़ा किया जा रहा है। वह कहते हैं कि घटना के बाद ही चारों के खिलाफ सामूहिक दुष्कर्म का आरोप क्यों नहीं लगाया गया। हाथरस के भाजपा सांसद राजवीर दिलेर की बेटी व राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग की सदस्य मंजू दिलेर से परिवार की मुलाकात के बाद ही दुष्कर्म का आरोप और तीन अन्य नाम बढ़ाए गए। सवाल यह है कि क्या दोनों बातों में कोई संबंध है?
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सवाल नंबर 4
अलग-अलग मेडिकल रिपोर्ट्स में अलग-अलग तथ्य
जब बेटी पर हमला हुआ तो उसे परिवार थाने के बाद जिला अस्पताल लेकर पहुंचा। जहां मात्र 35 मिनट बेटी रुकी और जिला अस्पताल के डॉक्टरों ने गले में चोट का हवाला देकर उसे जेएन मेडिकल कालेज अलीगढ़ रेफर कर दिया। वहां उसकी चोटों का एमएलसी हुआ, जिसमें शरीर के बाह्य हिस्सों यानि गर्दन में चोट, आंख व कंधे पर खरोंच के अलावा कुछ नहीं मिला। बेटी के 22 तारीख को दिए बयान के बाद हुए एमएलसी में जरूर दुष्कर्म होने के संकेत मौजूद बताए गए हैं। मगर फॉरेंसिक लैब में इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है। उधर, पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में दुष्कर्म की बात नहीं कही गई है, लेकिन योनि द्वार की झिल्ली का क्षतिग्रस्त होना और घाव ठीक हो जाना बताया गया है। सवाल है कि इनमें से किस रिपोर्ट पर लोग भरोसा करें।
सवाल नंबर 5
प्रशासन इन सवालों पर क्यों डालता रहा पर्दा
इस घटना के बाद जब शोर मचना शुरू हुआ तो प्रशासनिक स्तर से भी इन सवालों का तार्किक जवाब देने का प्रयास नहीं किया गया। अमूमन इस तरह की घटनाओं में प्रशासन की भूमिका पारदर्शिता की रहती है, लेकिन यहां तो प्रशासन का जोर मीडिया को गांव में पहुंचने से रोकने पर लगा रहा। फिर सवाल उठा कि अगर छुपाने को कुछ नहीं है तो प्रशासन की तरफ से इतनी परदादारी क्यों है?
पीड़ित पक्ष का कथन--
नार्को टेस्ट आरोपी का कराया जाता है पीड़ित का नहीं
अमर उजाला से बातचीत में बेटी के दोनों भाइयों ने कहा कि वे न्याय मिलने तक अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। किस्तों में आरोप लगाने के सवाल पर उनका कहना है कि शुरुआत में बहन खुद बदहवास थी, इसलिए ज्यादा कुछ नहीं बता पाई। बाद में उसने सब कुछ सामने बताया। उन्हें मालूम हुआ है कि उनकी मेडिकल रिपोर्टों में छेड़छाड़ हुई है। इसलिए वे न्यायिक जांच के मुद्दे पर अड़े हुए हैं। रहा सवाल नार्को न कराने का तो उनका कहना है कि नार्को आरोपी का कराया जाता है पीड़ित का नहीं। सीबीआई जांच का विरोध क्यों कर रहे हैं, इस पर उनका कहना है, सीबीआई पर उन्हें भरोसा नहीं, इसीलिए वे न्यायिक जांच चाहते हैं।
आरोपी पक्ष के तर्क
सच सामने आए, बेटे दोषी हो तो फांसी पर चढ़ा दो
दो नामजदों के पिता जो लगातार मीडिया से बातचीत कर रहे हैं वे एक ही दलील दे रहे हैं कि उनके बेटों सहित चारों आरोपी निर्दोष हैं। उन्हें एजेंसियों की जांच पर भरोसा है। वे कहते हैं कि लड़की के परिवार के लोग नार्को टेस्ट से क्यों डर रहे हैं। अगर उनके बेटे दोषी हैं तो फांसी पर चढ़ा दिए जाएं। कोई ऐतराज नहीं है। मगर इस घटना का सच सामने आना चाहिए। उन्हें किसी तरह का द्वेष किसी परिवार से नहीं है।
क्या कहता है कानून
कानूनी अहमियत रखता है बेटी का बयान
वरिष्ठ अधिवक्ता चंद्रशेखर दीक्षित का कहना है कि निर्भया कांड के बाद दुष्कर्म की परिभाषा बदल गई है। पेनीट्रेटिव इंटरकोर्स न हुआ हो लेकिन अगर इसका प्रयास किया गया हो तो भी नए कानून के तहत दुष्कर्म ही माना जाएगा। मौत से पहले पीड़िता द्वारा दिया गया बयान, जिसमें उसने चार आरोपियों द्वारा दुष्कर्म की बात कही है, भी कानूनी दृष्टि से बहुत अहमियत रखता है, लेकिन उसके पहले के बयान आरोपियों के पक्ष में जा सकते हैं।