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सुप्रीम कोर्ट की सलाह मानें तो रुके जेल में अपराध

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क्राइम न्यूज, अमर उजाला, अलीगढ़।
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कंप्यूटर के इस दौर में मैन पावर की मदद से निगरानी वैसे तो बेमानी साबित होती है। वैसे तो हमें बात सीसीटीवी की करनी चाहिए। मगर सुप्रीम कोर्ट की भी सीधी-सीधी गाइड लाइंस हैं कि जेलों में आने वाले बंदियों का शारीरिक व स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक परीक्षण भी कराया जाए।

उसकी मनोदशा जानने के बाद उससे उसी के अनुसार व्यवहार और उसकी निगरानी कराई जाए। जिससे किसी भी तरह का अपराध व बंदी की जान जाना रोका जा सकता है। मगर प्रदेश में शायद ही किसी जेल में यह प्रक्रिया अपनाई जा रही हो।
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अपनी अलीगढ़ जेल में पिछले एक दशक में सुसाइड की यह दूसरी घटना है। जब-जब इस तरह की घटना या आपराधिक वारदात जेलों में होती हैं, तब तब इस तरह के कायदे याद आते हैं, मगर चंद दिनों बाद फिर भुला दिए जाते हैं।

अब अलीगढ़ में निगरानी बढ़ाने की तैयारी
इस घटना के बाद अलीगढ़ जेल में बंदियों की निगरानी बढ़ाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की जा रही है। वरिष्ठ अधीक्षक कारागार बताते हैं कि वैसे तो मैन पॉवर की हमारे पास बेहद कमी है। अब तक अन्य कार्यों के लिए हम समझदार बंदियों में कुछ बंदियों को छांटकर उन्हें नंबरदार की भूमिका में तैनात करते हैं। अलीगढ़ जेल में 30 नंबरदार कार्यरत हैं। अब 50 के करीब नए नंबरदारों की छंटनी का काम शुरू करा दिया गया है। इन्हें बैरकों में बंदियों की निगरानी में भी लगाया जाएगा।

प्रदेश में पूर्व सैनिकों पर हो रहा मंथन
डीआईजी जेल संजीव त्रिपाठी बताते हैं कि प्रदेश भर की जेलों में मैन पावर की कमी है। हाल ही में हुई मुन्ना बजरंगी की हत्या के बाद सुरक्षा समिति गठित की गई है। उस समिति की ओर से प्रदेश की जेलों में पूर्व सैनिकों को जेलों के अंदर सुरक्षा व्यवस्था में लगाने पर विचार चल रहा है। उम्मीद है कि जल्द इस विषय में कोई हल निकल सकता है।

फुरकान की मॉनीटरिंग लेकर नहीं मिला समय
वरिष्ठ अधीक्षक कारागार आलोक सिंह की मानें तो वैसे तो जेल में जो भी बंदी आता है, उसे शुरू के दो या तीन दिन मुलायजा बैरक में रखा जाता है। वहां उसका स्वास्थ्य आदि का परीक्षण होता है। उसकी गतिविधियों पर नजर रखी जाती है। इसके बाद उसे दूसरी बैरक या जरूरत के अनुसार अस्पताल में शिफ्ट किया जाता है। 10 दिन तक वह मॉनीटरिंग में रहता है। वह क्या काम कर सकता है, यह देखा जाता है। मगर फुरकान चूंकि नशे का आदि था और उसके हाथ में चोट थी। इसलिए रात 8 बजे जेल में दाखिल होने के बाद रात 11 बजे उसे अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया था। इसलिए उस पर ज्यादा ध्यान नहीं गया और अगले दिन उसने यह कदम उठाया है। इसमें निगरानी सिपाही की लापरवाही मानी जा रही है। इसलिए उसके निलंबन की संस्तुति की गई है।
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यह बात सही है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह गाइड लाइंस दे रखी हैं कि सभी जेलों में बंदियों का मानसिक परीक्षण कराया जाए। इस दिशा में अब ठोस कदम उठाए जाएंगे। यह प्रदेश स्तरीय सुरक्षा समिति द्वारा जल्द तय किया जा सकता है।
- संजीव त्रिपाठी, डीआईजी जेल आगरा
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