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एन्काउंटर कर रही यूपी पुलिस का कस्टोडियल डैथ में उत्पीड़न?

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क्राइम डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
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जमीन की धोखाधड़ी कर लोगों को चूना लगाने के मुकदमे में 5 हजार के बहुचर्चित इनामी रहे रामू के भाई श्यामू की पुलिस हिरासत में मौत का मुकदमा 6 साल बाद भी यूपी पुलिस के लिए सिरदर्द बना हुआ है। कुछ समय पहले का एक ऑडियो वायरल हुआ है, जिसमें एसओजी टीम के आरोपी सिपाही दुर्विजय सिंह व रामू में बातचीत हो रही है। इस बातचीत में दुर्विजय ने कहा है कि भाई आपको साढ़े 17 लाख तो मिल गए हैं।

रामू 50 हजार और मांग रहा है। इस पर सिपाही तर्क दे रहा है कि जब पंचों के बीच हमारी बात 35 लाख में तय हुई और उसी डील के अनुसार आपको बतौर एडवांस नकद व बैंक खाते के माध्यम से साढ़े 17 लाख दे दिए तो 50 हजार क्यों। इस पर रामू कह रहा है कि बात 36 लाख में तय हुई है। इसलिए 50 हजार चाहिए। इस पर दोनों ओर से यह तर्क दिए जा रहे हैं कि यह बात गलत है। चलो फिर बात होगी।
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यह ऑडियो इन दिनों चर्चाओं में है। वहीं अब रुपये वसूलने के बाद रामू खुद को इस टीम से खतरा बता रहा है और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग कर रहा है। इस मुकदमे का दंश झेल रहे पुलिसकर्मी यह कहते नहीं सकुचाते कि अब तो अब तो उत्पीड़न हो रहा है। इस बात की गवाही दे रहा है वह ऑडियो जिसमें टीम में शामिल एक सिपाही व भाई की हत्या के मुकदमे की पैरोकारी कर रहे रामू की बातचीत में पुलिस से अब तक साढ़े 17 लाख रुपया वसूलना स्पष्ट है और शेष न मिलने की नाराजगी जाहिर की जा रही है। इतना सब तब जो रहा है, जब एक नहीं चार-चार जांच में इस टीम को बरी कर दिया गया।

हां, निचली अदालत स्तर से जरूर टीम के गैरजमानती वारंट जारी हैं और रामू अब टीम से खुद को खतरा बताकर अदालत से सुरक्षा मांग रहा है। खास बात यह है कि यह वही सिपाही है, जिसे यूपी एसटीएफ के तत्कालीन एसएसपी अमित पाठक ने एनआईए के डीएसपी तंजील अहमद हत्याकांड में 50 हजारी मुनीर की गिरफ्तारी के लिए अलीगढ़ से संबद्ध किया था और सफल होने पर तत्कालीन डीजीपी ने इस सिपाही को सम्मानित भी किया था।

यह है 6 साल पुराना प्रकरण
गभाना के गांव पनिहावर निवासी रामू व श्यामू सगे जुड़वा भाई थे। जो जमीन से जुड़ी धोखाधड़ी के विभिन्न मुकदमों के आरोपी रहने के साथ गैंगेस्टर में भी आरोपी रहे और पांच-पांच हजार के इनामी भी रहे। इसमें 94 लाख की ठगी का मुकदमा प्रमुख था। हालांकि श्यामू ने अपनी जमानत करा ली थी। मगर दोनों के चेहरे मिलते थे। 15 अप्रैल 2012 को एसओजी टीम रामू की तलाश में उसकी बहन के गांव रुस्तमपुर पहुंची। वहां दोनों भाई मिल गए और चेहरे एक जैसे होने के कारण पुलिस दोनों को ले आई।

थाने लाकर स्पष्ट हुआ कि कौन रामू है तो रामू को तो हवालात में कर दिया गया, लेकिन श्यामू को बाहर ही रखा गया। बकौल पुलिस इसी बीच श्यामू ने अनायास किसी दहशत में अपनी जेब से कुछ विषाक्त जैसा निकाल कर खा लिया। इस पर उसकी तबियत बिगड़ गई। इसके कुछ देर बाद टीम उसे थाने से मेडिकल कालेज लेकर पहुंची। जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इस संबंध में इनके तीसरे भाई की ओर से तत्कालीन एसओजी टीम के इंचार्ज आनंद प्रकाश, सब इंस्पेक्टर प्रमोद कुमार, सदस्य सिपाही रामनाथ, अशोक, वीरेंद्र सिंह, दुर्विजय, संजय पर पीट-पीटकर हत्या का मुकदमा दर्ज कराया। तब से मुकदमा पुलिस की अंतिम रिपोर्ट के बाद अदालत में रामू द्वारा की गई पैरवी के चलते लंबित है। हालांकि अदालत से बाहर रामू ने पैरोकारी के दम पर पुलिस, प्रशासन, मानवाधिकार आयोग, मजिस्ट्रेटी जांच, न्यायिक जांच कराई। हर स्तर पर टीम को बरी कर दिया गया।


हाईकोर्ट ने नहीं माना इसे कस्टोडियल डैथ
रामू ने इसी प्रकरणम में अपनी ओर से एक याचिका हाईकोर्ट में 50 लाख रुपये का मुआवजा आरोपियों व पुलिस प्रशासन से दिलवाने की मांग की। इस पर हाईकोर्ट ने पूरे प्रकरण की सुनवाई के बाद दिसंबर 2017 में यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि साक्ष्यों के आधार पर यह कस्टोडियल डैथ ही नहीं है। इसलिए मुआवजा नहीं दिलाया जा सकता।

अब खुद रामू ने पेश किए हाईकोर्ट में गलत तथ्य
हाल ही में रामू ने हाईकोर्ट में एक अन्य याचिका दायर कर खुद की सुरक्षा मांगी। जिसमें पहला तथ्य उसने यह पेश किया कि पूर्व में उसने इस संबंध में कोई याचिका दायर नहीं की, जबकि इसी प्रकरण में वह पूर्व में हाईकोर्ट के आदेश पर सुरक्षा ले चुका है। बाद में उसने वह सुरक्षा खुद वापस कर दी थी। दूसरा उसने यह तथ्य पेश किया कि उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, जबकि पुलिस रिकार्ड में उस पर एक दर्जन के करीब मुकदमे दर्ज हैं। हालांकि अदालत ने उसकी इस याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि पहले जिला प्रशासन के पास जाएं।
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- यह ऑडियो पूरी तरह फर्जी है, मैंने इस तरह की कोई बात नहीं कही है। इसकी जांच कराई जा सकती है। रहा सवाल सुरक्षा मांगने का तो मैं कोर्ट से सभी मुकदमों में बरी किया जा चुका हूं। जिससे कोर्ट को अवगत करा दिया जाएगा। -रामू, पैरोकार व मृत श्यामू का भाई

पुलिस स्तर पर प्रक्रिया
-15 अप्रैल 2012 को पुलिस हिरासत में मौत पर लगा था हत्या का आरोप
-3 माह बाद पुलिस विवेचक ने मुकदमे में अंतिम रिपोर्ट लगा कोर्ट में भेजी
-पैरोकार के प्रयास से सीओ खैर द्वारा पुन: विवेचना कर फिर अंतिम रिपोर्ट
-फिर मानवाधिकार आयोग के निर्देश पर सीबीसीआईडी जांच में भी एफआर
-डीएम के निर्देश पर एसडीएम खैर ने मजिस्ट्रेटी जांच में भी आरोप नकारे
-सितंबर 2017 में न्यायिक जांच में भी पुलिस टीम को बरी कर दिया गया

अदालती स्तर पर प्रक्रिया
-सीबीसीआईडी की एफआर को सीजेएम न्यायालय ने खारिज कर दिया था
-सत्र न्यायालय में आरोपियों की रिवीजन याचिका भी खारिज कर दी गई थी
-अब सीजेएम न्यायालय से आरोपियों के खिलाफ जारी हो रखे हैं वारंट भी
-दिसंबर 2017 में हाईकोर्ट ने एक याचिका में कस्टोडियल डैथ नहीं माना
-पीड़ित की मुआवजा दिलाए जाने संबंधी याचिका को खारिज किया गया है
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