क्राइम डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
अपंजीकृत वसीयत के एक मामले में बिना दूसरे पक्ष को सुने एक तरफा फैसला करने और 132 बीघा जमीन को दूसरी पार्टी के पक्ष में दाखिल खारिज कर देने के मामले में अदालत ने 6 साल बाद अंतिम रिपोर्ट को निरस्त कर दिया। साथ ही तत्कालीन तहसीलदार को अदालत में तलब किया है।
वादी पक्ष के अधिवक्ता ठा. वीरपाल सिंह जादौन ने बताया कि विशाल सिंह तोमर निवासी जेल रोड की आबादी गांवरी तहसील गभाना पर 132 बीघा जमीन है। सन 2012 में दूसरे पक्ष ने एक अपंजीकृत वसीयत प्रस्तुत करते हुए उक्त भूखंड पर अपना वादा प्रस्तुत किया। वीरपाल सिंह जादौन ने बताया कि इस मामले में उस समय तहसीलदार रहे प्रवरशील बरनवाल ने वादी पक्ष को सुने बिना ही दूसरे पार्टी के पक्ष में 132 बीघा जमीन का दाखिल खारिज कर दिया।
यह वसीयत 17 साल बाद प्रस्तुत की गई थी, जबकि कानून है कि वसीयत मृत्यु के एक महीने के अंदर ही प्रस्तुत की जानी चाहिए। इस आदेश के खिलाफ वादी पक्ष की अपील के बाद एसडीएम गभाना ने तहसील दार के आदेश को निरस्त कर दिया। इसके खिलाफ दूसरी पार्टी कमिश्नर के यहां पर पहुंची तो वहां पर भी फैसला वादी पक्ष के हक में हुआ।
तहसीलदार ने इसके बाद भी दो अपीलीय कोर्ट के आदेश को दरकिनार करते हुए हड़ताल के दौरान एक बार फिर से दूसरी पार्टी के हक में जमीन का दाखिल खारिज कर दिया। वादी पक्ष ने तहसीलदार के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। इसमें गभाना क्षेत्राधिकारी ने तहसीलदार को बरी कर दिया और अंतिम रिपोर्ट लगा दी।
जिसको एसपी सिटी ने निरस्त कर दिया और जांच सीओ क्राइम को सौंपी गई। इसके बाद मामला पुलिस और प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरा और इसमें अंत में फाइनल रिपोर्ट ही लगी। इसके खिलाफ वादी पक्ष के अधिवक्ता वीरपाल सिंह जादौन ने विरोध याचिका अदालत में दायर की।
जिसे अदालत ने स्वीकार लिया और इस मामले में लगाई गई फाइनल रिपोर्ट को निरस्त करते हुए तत्कालीन तहसीलदार को 25 मई को अदालत में तलब किया है।