जेएन मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर होने वाले मरीजों की ताक में निजी एंबुलेंस चालक रहते हैं। रेफर होने वाले मरीजों को सीधे निजी अस्पताल ले जाते हैं। बताया जाता है कि निजी एंबुलेंस चालक को मरीज के रेफर के बारे में जानकारी रहती है। जेएन मेडिकल कॉलेज के बाहर मरीजों को निजी अस्पतालों में ले जाने वाले बिचौलियों को घूमते देखा जा सकता है।
पदोन्नति का दर्द
जेएन मेडिकल कॉलेज में कार्यरत असिस्टेंट और एसोसिएट प्रोफसर का करीब 15-16 साल से पदोन्नति नहीं हुई है, जिसका दर्द छलकता रहता है। इससे कामकाज भी प्रभावित होता है। इसी तरह पैरामेडिकल में काम करने वाले कर्मचारी ठेके या अस्थायी पर हैं। स्थायी कर्मचारियों की अपेक्षा उन्हें काफी कम मानदेय मिलता है। सभी अपने स्थायित्व को लेकर परेशान रहते हैं। उन्होंने स्क्रीनिंग कमेटी के जरिये उन्हें स्थायी करने की मांग की है।
ये भी जानें
- जेएन मेडिकल की स्थापना वर्ष 1962 में
- मेडिकल कॉलेज परिसर में चार मेडिकल स्टोर
- हर साल 25 करोड़ 35 लाख का बजट
- मेडिकल कॉलेज में 1269 बेड
- पर्चे बनाने के लिए हैं आठ काउंटर
- रोजाना छह-सात हजार आते हैं मरीज
- सुबह 8 बजे दोपहर 12:30 तक बनते हैं पर्चे
- शुक्रवार को सुबह 8 बजे से 11:30 तक बनते हैं पर्चे
- एमबीबीएस विद्यार्थियों की शत-प्रतिशत हाजिरी हो
इन सहूलियतों की जरूरत
- रक्त जांच के लिए वार्ड में बने काउंटर
- इमरजेंसी हॉल का दायरा और बड़ा हो
- टीबी जांच का हॉल बड़ा होना चाहिए
- ऑनलाइन पर्चा और भुगतान की व्यवस्था हो
- सफाई पर और ध्यान देने की जरूरत
- मेडिकल कॉलेज का बजट का विस्तार हो
- हड़ताल को लेकर गाइडलाइन बने
- वार्ड में तीमारदार के लिए कार्ड बने