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JN Medical College: न नब्ज देखी, न ही लगाया आला, बस दवा का पर्चा लिख डाला, एक मरीज के लिए बस दो मिनट

Thu, 11 Jul 2024 03:07 PM IST
चमन शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़

सार

रविवार को छोड़कर रोजाना जेएन मेडिकल कॉलेज पर मरीजों के छह हजार पर्चे बनते हैं, लेकिन डॉक्टर सिर्फ पांच हजार मरीजों को देख पाते हैं। मरीजों की लंबी कतार लगी होने के कारण एक डॉक्टर एक मरीज को बामुश्किल से दो मिनट ही दे पाता है।
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जेएन मेडिकल में पर्चा बनवानें के लिए लगी भीड़ - फोटो : संवाद
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विस्तार
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अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में डॉक्टर इलाज के नाम पर मरीज को बामुश्किल दो मिनट का ही वक्त देते हैं। बस मरीज से बीमारी पूछी और दवाएं लिख कर पर्चा थमा देते हैं। मरीज की न तो नब्ज देखते और न ही स्टेथोस्कोप (आला) लगाकर जांच करते हैं। ऐसे में मरीज जब कक्ष से बाहर आता है तो उसकी जुबां पर यही बात होती है कि डॉक्टर ने पूरी बात सुनी ही नहीं, बस मर्ज पूछा और दवा लिख कर दे दी।

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रविवार को छोड़कर रोजाना यहां पर मरीजों के छह हजार पर्चे बनते हैं, लेकिन डॉक्टर सिर्फ पांच हजार मरीजों को देख पाते हैं। मरीजों की लंबी कतार लगी होने के कारण एक डॉक्टर एक मरीज को बामुश्किल से दो मिनट ही दे पाता है। मेडिकल कॉलेज में करीब 200 डॉक्टर (प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर) हैं। ऐसे में अलीगढ़ सहित आसपास जिलों से आने वाले हजारों मरीजों का सही तरीके से इलाज करना मुश्किल होता है।

मेडिकल कॉलेज में मरीजों का इलाज सर्वोपरि है। डॉक्टर हो या पैरामेडिकल स्टाफ हर कोई अपना शत-प्रतिशत दे रहा है। मेडिकल कॉलेज का बजट 25 करोड़ 35 लाख रुपये का है। स्टाफ पर्याप्त है। मरीज और तीमारदार मेडिकल कॉलेज को स्वच्छ रखने में कॉलेज का सहयोग करें। गरीब मरीजों को दवाएं मेडिकल कॉलेज से दी जाती हैं।- प्रो. वसीम रिजवी, मेडिकल सुपरिटेंडेंट, जेएन मेडिकल कॉलेज।

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डॉक्टर को दिखाने आए थे, लेकिन केवल एक-दो मिनट देखा और दवाएं लिख दीं। मैं कुछ बताती, इससे पहले बोला फिर आना।- कमलेश, खुर्जा, मरीज।
डॉक्टर को पूरी बात नहीं बता पाते हैं। डॉक्टर आराम है, पूछकर दवाएं लिख देते हैं। पूरी बात मेरी सुनें तो मुझे तसल्ली हो जाए।-रूप सिंह, डिबाई, मरीज।

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मरीजों की ताक में रहते निजी एंबुलेंस

जेएन मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर होने वाले मरीजों की ताक में निजी एंबुलेंस चालक रहते हैं। रेफर होने वाले मरीजों को सीधे निजी अस्पताल ले जाते हैं। बताया जाता है कि निजी एंबुलेंस चालक को मरीज के रेफर के बारे में जानकारी रहती है। जेएन मेडिकल कॉलेज के बाहर मरीजों को निजी अस्पतालों में ले जाने वाले बिचौलियों को घूमते देखा जा सकता है।
जेएन मेडिकल के बाहर खड़ी एम्बुलेंस
पदोन्नति का दर्द
जेएन मेडिकल कॉलेज में कार्यरत असिस्टेंट और एसोसिएट प्रोफसर का करीब 15-16 साल से पदोन्नति नहीं हुई है, जिसका दर्द छलकता रहता है। इससे कामकाज भी प्रभावित होता है। इसी तरह पैरामेडिकल में काम करने वाले कर्मचारी ठेके या अस्थायी पर हैं। स्थायी कर्मचारियों की अपेक्षा उन्हें काफी कम मानदेय मिलता है। सभी अपने स्थायित्व को लेकर परेशान रहते हैं। उन्होंने स्क्रीनिंग कमेटी के जरिये उन्हें स्थायी करने की मांग की है।

ये भी जानें
- जेएन मेडिकल की स्थापना वर्ष 1962 में
- मेडिकल कॉलेज परिसर में चार मेडिकल स्टोर
- हर साल 25 करोड़ 35 लाख का बजट
- मेडिकल कॉलेज में 1269 बेड
- पर्चे बनाने के लिए हैं आठ काउंटर
- रोजाना छह-सात हजार आते हैं मरीज
- सुबह 8 बजे दोपहर 12:30 तक बनते हैं पर्चे
- शुक्रवार को सुबह 8 बजे से 11:30 तक बनते हैं पर्चे
- एमबीबीएस विद्यार्थियों की शत-प्रतिशत हाजिरी हो

इन सहूलियतों की जरूरत
- रक्त जांच के लिए वार्ड में बने काउंटर
- इमरजेंसी हॉल का दायरा और बड़ा हो
- टीबी जांच का हॉल बड़ा होना चाहिए
- ऑनलाइन पर्चा और भुगतान की व्यवस्था हो
- सफाई पर और ध्यान देने की जरूरत
- मेडिकल कॉलेज का बजट का विस्तार हो
- हड़ताल को लेकर गाइडलाइन बने
- वार्ड में तीमारदार के लिए कार्ड बने
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