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अतीत का अलीगढ़ 2: 1804 में क्लाउड रसेल बनाए गए थे अलीगढ़ के पहले कलक्टर, ऐसे बना था जिला

Wed, 18 Oct 2023 02:46 AM IST
चमन शर्मा कुमार अतुल, अमर उजाला, अलीगढ़

सार

राज्य सरकार ने एक शासनादेश के जरिए प्रदेश के सभी जिलों के लिए नया जिला गजेटियर तैयार करने का आदेश दिया है। उसके लिए कमेटियों का गठन किया जा रहा है। अलीगढ़ का अंतिम गजेटियर 1909 में तैयार किया गया था। लगभग 400 पेजों की इस पुस्तक में लगभग 114 साल पुराने अलीगढ़ के भूगोल, नदियों, प्रशासनिक व्यवस्था, सिंचाई व ड्रेनेज सिस्टम, पुलिस व्यवस्था आदि के बारे में विस्तार से वर्णन है। इस संबंध में अतीत का अलीगढ़ नाम से एक समाचार श्रृंखला शुरू की जा रही है। उम्मीद है कि पुराने अलीगढ़ के बारे में जानकारी पाठकों को रुचिकर लगेगी। कृपया अपनी राय से हमें अवगत कराएं।
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अतीत का अलीगढ़ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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आंग्ल-मराठा युद्ध 1803-1805 के दौरान लड़ा गया था। ब्रिटिश सेना की 76वीं बटालियन ने अलीगढ़ के किले पर अपना कब्जा जमा लिया था। इससे पहले यह फ्रांसीसी अफसर पेरोन के कब्जे में था। 1804 में मुरादाबाद के अनूपशहर  (मौजूदा समय में बुलंदशहर की तहसील) और इटावा की सिकंदराराऊ तहसील को मिलाकर अलीगढ़ जिले की स्थापना की गई। क्लाउड रसेल अलीगढ़ के पहले कलक्टर बनाए गए थे। हालांकि अलीगढ़ का जिक्र मोरक्को के मशहूर यात्री इब्न बतूता ने अपने यात्रा वृत्तांत में एक सराय या पड़ाव के तौर पर किया है। 

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अकबर और बाद के मुगल शासकों के लिए अलीगढ़ एक शिकारगाह के तौर पर मशहूर रही थी। अंग्रेजों के कब्जे में आने के बाद अलीगढ़ में प्रशासनिक तौर पर व्यापक परिवर्तन देखे गए। विकास की दौड़ में भी यह जिला तेजी से दौड़ा।

1800-1850 तक ढाक के घने जंगल हुआ करते थे अलीगढ़ में
अब अलीगढ़ में जंगल देखने को नहीं मिलता। अलीगढ़ गजेटियर में वर्णित है कि उन्नीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में जब अलीगढ़ अंग्रेजों के कब्जे में आया तब  इस जिले में ढाक के घने जंगल हुआ करते थे। लेकिन बेलगाम कटान से 1850 तक आते-आते यह जंगल लगभग खत्म हो गए। उन जमीनों पर खेती होने लगी थी। 1909 के आसपास जंगल बहुत कम क्षेत्र में रह गए थे। इनका ज्यादातर हिस्सा तत्कालीन जमींदारों ने जलौनी ईधन के तौर पर संरक्षित रखा था। इस दौर में चंडौस परगना के हलके पिसावा के जाट जमींदारों ने कुछ जंग बचाए रखा था। 
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जंगल की एक पतली पट्टी अतरौली तहसील के ऊसर वाले इलाकों में पठान जमींदारों ने बचा रखी थी। सिकंदराराऊ और अलीगढ़ तहसील में भी थोड़े हिस्से में जंगल बच गए थे। अलबत्ता, गंगा के खादर में झाऊ के जंगल फैले हुए थे। इनका आर्थिक मोल तो ज्यादा नहीं था, लेकिन इनमें सुअर समेत कई जंगली जानवरों का डेरा था। जंगली जानवर फसलों को काफी नुकसान पहुंचाते थे। लिहाजा ये जमींदारों और किसानों के निशाने पर रहे।

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कभी इगसाल तहसील में आम का एक ही पेड़ था

गंग नगर से निकाले गई सहायक नहरों के किनारे नहर विभाग ने बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करवाया था। आम के पेड़ बड़ी संख्या में देखे जाते थे। लेकिन इगलास तहसील इसका अपवाद थी। इसमें आम का एक ही पेड़ था। यह पेड़ सभी स्थानीय लोगों के आकर्षण का केंद्र था। बबूल के पेड़ों की बहुतायत थी, जो इस इलाके में बड़ी आसानी से उग जाता था। इसके अलावा नीम, गूलर, बेर और जामुन के पेड़ भी ठीकठाक संख्या में उगे हुए थे। 1870 के बंदोबस्त दस्तावेज के अनुसार बागवानी का कुल रकबा 5676 एकड़ था। अगले पांच साल में इसका रकबा बढ़ कर 8871 एकड़ हो गया था, लेकिन यह अलीगढ़ की कुल भूमि के एक फीसदी ( .71 फीसदी)से भी कम था। 

पूरी इगलास तहसील में सिर्फ 262 एकड़ में बागवानी हुआ करती थी, जो कुल भूमि का सिर्फ .19 फीसदी था। खैर (.31 फीसदी) और हाथरस (.58 फीसदी) तहसीलों में भी बागवानी की स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी। प्रशासनिक नीतियों की वजह से बागवानी में इजाफा दर्ज किया गया था। अलीगढ़ में 2003 एकड़ (.88 फीसदी) जमीन बागवानी के अधीन थी। अतरौली की स्थिति 2274 एकड़ (1.04 फीसदी ) के साथ कुछ बेहतर थी। सबसे ज्यादा बढ़ोतरी सिकंदराराऊ में देखी गई थी। 1478 एकड़ के स्थान पर यहां बागवानी का रकबा 2425 एकड़ तक पहुंच गया। यह कुल भूमि का 1.13 फीसदी था।
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