80 के दशक से पहले नालों के पानी में हार्डवेयर और मीट फैक्टरियों का पानी नहीं था, इसलिए नालों के पानी का इस्तेमाल खेतों में होता था। अब ये पानी काफी दूषित है, लेकिन किसान अन्य साधन न होने के कारण इसी पानी से सिंचाई करते हैं।- कैलाश सैनी, किसान, तुर्कमान गेट
नालों के किनारों पर खेत होने के कारण नालों का पानी खेतों में लगा लिया जाता है। पिछले कुछ सालों से ये पानी ज्यादा खराब हुआ है। कुछ बड़े किसानों ने अपने सबमर्सिबल भी लगाए हैं, लेकिन ज्यादातर किसान नालों का पानी ही ले रहे हैं।- अय्यूब खान, किसान, तालशपुर
नालों में गिर रहे हार्डवेयर और मीट फैक्टरियों के पानी को रोक दिया जाए तो इसका उपयोग खेती में करने में कोई परेशानी नहीं है, लेकिन प्रशासन इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है। इसे लेकर शासन स्तर पर शिकायत भी की गईं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।- मो. समीर, किसान, अमरपुर
अलीगढ़ ड्रेन का पानी सिंचाई के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है, लेकिन इसमें फैक्टरियों का पानी जाना नियम विरुद्ध है। प्रदूषण विभाग को इस पर नजर रखनी चाहिए।- राजेंद्र कुमार, अधिशासी अभियंता, सिंचाई विभाग
नालों के आसपास के खेतों की मिट्टी की जांच कराई जाएगी। दूषित पानी खेतों में जाने से रोकने के लिए सिंचाई विभाग और प्रदूषण विभाग को पत्र लिखेंगे।- धीरेंद्र चौधरी, जिला कृषि अधिकारी
नालों के पानी में लेड, मैग्नीशियम, क्रोमियम, कॉपर, निकिल, मरकरी जैसे हैवी मेटल्स शामिल हैं। इसके अलावा इकोलाई, सालमोनेला बिबरियो, निमिरोड बैक्टीरिया पानी में हैं। सिंचाई के बाद ये हैवी मेटल्स और बैक्टीरिया माइक्रो लेवल पर जड़ के माध्यम से फल अथवा सब्जियों तक पहुंचते हैं। जो खाने के बाद लोगों के शरीर में पहुंचते हैं।
ये फैलती हैं बीमारियां
एएमयू के प्रो. मुजीबुर्रहमान खान ने बताया कि इकोलाई बैक्टीरिया पेट में अपच, आंतों में सूजन, भारीपन आदि बीमारियां फैलाता है। सालमोनेला और बिबरियो बैक्टीरिया हैजा, डायरिया जैसी बीमारियां देता है। निमिरोड पेट में कीड़े पैदा करता है। हैवी मेटल्स पाचन शक्ति को खराब कर देते हैं, जिससे पेट की गंभीर बीमारियों से लेकर लिवर और हृदय को प्रभावित करते हैं। हृदयाघात की संभावना बढ़ जाती है।
शोध में उजागर हो चुकी है सच्चाई
एएमयू के कृषि संकाय में पौधा संरक्षण विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. मुजीबुर्रहमान खान ने बताया कि अलीगढ़ में खेतों की सिंचाई में दूषित पानी के उपयोग पर शोध किया गया, जिससे में पता चला था कि हैवी मेटल्स और घातक बैक्टीरिया नालों के पानी में हैं, जो जड़ के माध्यम से सब्जी तथा फल तक पहुंचते हैं। इन्हें खाने के बाद ये लोगों के शरीर में पहुंचकर नुकसान पहुंचाते हैं।