एक तरफ किसान निराश्रित गोवंश से फसलों को बचाने में कड़ाके की ठंड में खेतों की निगरानी कर रहे हैं। खेतों में बाड़ लगा कर उसमें करंट उतारा जा रहा है, जिससे हाल ही में जवां के बरौली गांव कटरा मार्ग पर एक तेंदुए की मौत हो गई। जिसमें खेत मालिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है। वहीं सरकारी सिस्टम की उदासीनता से गोवंश के चारे का भुगतान, उनको सर्दी से बचाने के लिए होने वाले इंतजाम नहीं हो सके हैं। आलम ये है कि साल (वित्तीय वर्ष 2020-21 तक) में चारे के लिए 11.75 करोड़ रुपये की मांग के सापेक्ष अभी तक केवल 6.55 करोड़ रुपये ही मिले हैं। दिसंबर तक नौ करोड़ रुपये आना चाहिए था, लेकिन सितंबर, अक्तूबर, नवंबर, दिसंबर का भुगतान बकाया है, आधी जनवरी गुजर गई है। जनवरी के बाद भी वित्तीय वर्ष में फरवरी और मार्च दो महीने शेष रह जाएंगे। हाल ही में आई एक करोड़ की किस्त से सभी गोशालाओं में चारे की व्यवस्था की जा रही है। प्रदेश सरकार से अलीगढ़ को प्रति माह 11 हजार गोवंश के लिए 30 रुपये प्रति दिन के हिसाब से चारे का भुगतान मिलता है। महीने में ये रकम लगभग 99 लाख रुपये तक पहुंच जाती है।
कड़ाके की ठंड में गोवंश को बचाने के लिए अधिकांश गोशालाओं में स्थानीय लोगों की मदद से जूट की बोरी, टाट, तिरपाल आदि लगवाया गया है। बीते वर्ष जिलापूर्ति विभाग और शासन से कुछ बोरे और तिरपाल मिली थी। इस वर्ष कुछ नहीं मिला है। गोवंश को जूट के झूलन पहनाने की दिशा में भी कोई काम नहीं हो सका है। मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. बीपी सिंह ने बताया कि कई गोशालाओं में बाजरा की करब लगा दी गई है। एक दो घंटे कंडे और लकड़ी का अलाव जलवाया जा रहा है। स्थानीय लोगों की मदद से व्यवस्था की जा रही है। जूट की झूलन की स्थानीय स्तर पर खरीदारी नहीं हुई है।