जे ब्लंट ने हाथरस में 1817 में नील की फैक्टरी खोली थी। अंग्रेज लिखते हैं कि क्षेत्र में मराठों का प्रभुत्व होने पर नील पर भारी कर लगाया गया जिससे इसका उत्पादन प्रभावित हुआ था। अंग्रेजी राज में इन करों को खत्म कर दिया गया था। अंग्रेजों ने इसके बाद तहसीलदारों को किसानों के साथ नील की खेती करने के करार के लिए अधिकृत किया। इससे जिले में नील की खेती को प्रोत्साहन मिला। नील की खेती करने वालों को फैक्टरियों के अलावा सरकार भी पुरस्कृत करती थी। 1830 में नील की खेती के लिए विख्यात कलकत्ता हाउस की विफलता ने नील के खेतिहरों की बर्बादी की कहानी लिख डाली। 1834 में कलकत्ता हाउस की तमाम परिसंपत्तियां और कर्ज की हुंडियां कौड़ियों के मोल नीलाम की गई थीं। इनके ज्यादातर खरीदार साहूकारी में लिप्त थे। अपनों कर्जों की एवज में इन लोगों ने अदालतों से गांव के गांव नीलाम करा डाले।
1862 में नील के कारोबार ने फिर गति पकड़ी
पटरी से उतरने के बाद जिले में 1862 ईस्वी में एक बार फिर नील के कारोबार ने गति पकड़ी, लेकिन हालात 1830 के पहले जैसे नहीं हो सके। बहरहाल, 1870 में जिले में नील की खेती का रकबा 2908 हेक्टेयर था। अलीगढ़ में 1873 ईस्वी में नील की कुल 171 फैक्टरियां उत्पादन कर रही थीं। इनमें से ज्यादातर सिकंदराराऊ और अलीगढ़ में स्थापित थीं। 1884-85 तक आते-आते नील के रकबे में भारी इजाफा हुआ। इस साल तक कुल 65584 एकड़ जमीन पर नील की खेती की जा रही थी। हालांकि अगले दशक (1892-93) में इसके रकबा सिकुड़ कर 40387 एकड़ रह गया था। अगले पांच वर्षों में इसमें थोड़ी थी बढ़ोतरी हुई। इस दौरान नील का रकबा 43080 एकड़ तक पहुंच गया।
नील की खेती के पतन के कारण
बीसवीं सदी की शुरुआत से पहले ही कुदरती रंगों के स्थान पर कृत्रिम रंगों का निर्माण शुरू हो गया था। कृत्रिम रंगों का उत्पादन आसान था। इनमें मेहनत कम लगती थी और ये सस्ते भी थे। लिहाजा जिले से नील की खेती का आकार सिकुड़ता गया। 1905 के बाद तो इसका रकबा सिर्फ 2218 एकड़ रह गया। इगलास और हाथरस में तो इसका पूरी तरह नामोनिशान मिट गया।
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स्रोत- अलीगढ़ का गजेटियर (1878-1909)