1807 के रेगुलेशन संख्या 10 के तहत तैनात बोर्ड ऑफ कमिश्नर की बैठक दिसंबर माह में अलीगढ़ में हुई। तत्कालीन कलक्टर ने लिखा कि युद्धों और खराब फसली सीजन की वजह से कुल कृषियोग्य भूमि के सिर्फ 60 फीसदी हिस्से में ही खेती हो सकी थी। हालांकि वह यह भी लिखता है कि इस दशा में सुधार हो जाने पर छह साल में राजस्व छह लाख रुपये सालाना हो जाएगा।
1803 और 1805 के रेगुलेशनों ने तहसील व्यवस्था को दिया जन्म
अंग्रेजों ने अपने द्वारा जीते गए क्षेत्रों में बंदोबस्त व्यवस्था लागू की थी। इसके लिए रेगुलेशन जारी किए गए थे। 1803 और 1805 के रेगुलेशनों ने तहसील व्यवस्था को जन्म दिया था। इससे पहले राजस्व वसूली करने वाले जमींदारों को कुल वसूली का 10 फीसदी कमीशन दिया जाता था। तहसील व्यवस्था में तहसीलदारों का वेतन तय कर दिया गया था। मथुरा और जिले के पूर्वी परगनों में नए बंदोबस्त किए गए। यह दयाराम, भगवंत सिंह और हरकिशन जमींदारों के साथ किए गए थे। मिस्टर ईलियट नाम के अंग्रेज अफसर की तैनाती दिसंबर 1808 में की गई थी जिसने जिले के अन्य क्षेत्रों में बंदोबस्त को अंजाम दिया था।
1810 में अलीगढ़ जिले से कुल 3103793 रुपये राजस्व की प्राप्ति हुई थी
1810-11 के राजस्व वर्ष में अलीगढ़ जिले से कुल राजस्व प्राप्ति 3103793 रुपये की थी। इसकी उगाही में 3324 लोग लगाए गए थे। 1833 में जॉन थार्नटन अलीगढ़ का डिप्टी कलक्टर बना। उसे 1833 में नवें रेगुलेशन के तहत हुए बंदोबस्त को खत्म करने का काम सौंपा गया। बतौर बंदोबस्त अधिकारी वह पांच साल तक रहा। इस दौरान उसने हाथरस, मुरसान, गोराई, हसनगढ़, खैर, चंडौस, सोमुआ, कोल, अतरौली, मुरथल, भमौरी और दतौली का बंदोबस्त किया। इसके अलावा टप्पल परगने का भी बंदोबस्त किया जो बेगम समरू की जागीर का एक हिस्सा रहा। इसके बाद उनकी जगह पर 1838 में एच रोज तैनात हुए। उन्होंने बचे परगनों का बंदोबस्त किया। इसमें सिकंदराराऊ, अकराबाद, जलाली और बरौली शामिल थे।
जारी...
स्रोतः अलीगढ़ का गजेटियर 1878-1909